Friday, July 7, 2017

ऑलमोस्ट डाइड,

कभी- कभी इस बेनूर सी जिंदगी में
चुपके से जीना पड़ता है
इतना धीमे की पता भी न चले की सांस का आरोह- अवरोह है भी या नहीं
हम अपनी ही देह को निस्तेज 
और निढाल पड़ा देखते हैं दूर कहीं सुमसाम में
हवा में
हम ऐसे रह गए यहाँ
जैसे छोड़ दी गई जगह कोई
न नगर, न खरपतवार कोई
मन बसता भी नहीं, उजड़ता भी नहीं
दिल्ली में चौंसठ खंभा से कुछ ही दूरी पर
हज़रत निज़ामउद्दीन औलिया की दरगाह के पास
ग़ालिब की सूनी कब्र से हम
सूखे हुए गुलाब के फूल उड़ते हों बगैर खुशबू के जहाँ
पीपल के सूखे पत्तें गर्मियों के दिनों में सरसरा जाते हों दरगाह के फर्श पर जैसे
बारिशों में भीग-भीगकर स्याह काले हो जाते हों पत्थर जहाँ
कोई शायर भरी महफ़िल में
अपनी याददाश्त खो बैठे
शेर याद आए तो मिसरा भूल जाए
या फेज़ का कोई शेर हवा में अटक जाए ऐसे
की उसे वाह भी न मिले और आह भी न मिले
कभी- कभार हम खुद ही
अपनी कलाई पकड़ नस दबाकर देख लेते हैं
हम हैं की नही
किसी के पास कोई हकीमी हुनर हो तो आएं
और देखे
नब्ज़ टटोल लें
बताएं हम हैं की नहीं
तुम हो की नहीं
तुम, हां तुम ही।

- ऑलमोस्ट डाइड,

Sunday, July 2, 2017

जैसे नीला समंदर अपने भरे गले से गा रहा हो.


किसी ऊँची जगह पर चढ़ना और मेहदी हसन की ग़जल सुनना, कमोबेश दोनों का एक ही हासिल है, कम अज कम मेरे लिए तो। ऐसा सुख जिसे हम किसी ऊंचाई पर पहुँच कर भोगते हैं- जैसे पहाड़ पर चढ़ने का सुख।
जगजीत सिंह ज्यादातर गज़लों में दुःख गाते हैं। वे एक राग रुदन के साथ तुम्हे अंधेरे में तन्हां छोड़ देते हैं। अगर उनके गाये पंजाबी टप्पों को छोड़ दिया जाए तो, वे अपनी अधिकतर गज़लों में ताउम्र पीड़ा ही गुनगुनाते रहे।
इसके बरअक्स, मेहदी हसन इश्क़ गाते थे। राग इश्क। उनकी खरज हमें रूमानी हासिल के साथ एक क्लैसिक हाइट पर ले जाती है- एक रूमानी गहराई में। इश्क और मौसिकी दोनों में एक साथ सबसे ऊँची जगह होने का अंदाज़ देती हुई। प्रेम में होने और मौसिकी के सुर- ताल, स्वर लहरियां व इबारत समझने की मिक्स फीलिंग। कई बार उन्हें सुनने के दौरान हम कुछ भी दर्ज नहीं कर पाते। कोई टेक्स्ट नहीं, कोई कविता नहीं।
लता मंगेशकर ने एक बार कहीं कहा था- ' मेहदी हसन की आवाज़ ख़ुदा की आवाज है ' - ख़ुदा ने ख़ुदा की आवाज़ को ख़ुदा कहा। सुनिए, ख़ुदा की आवाज़ कैसी होगी।
करीब बाईस साल पहले एक टूरिस्ट बस में पहली बार मेहदी हसन की आवाज़ सुनी थी, पहली गज़ल थी- ' जिंदगी में तो सभी प्यार किया करते हैं ' दूसरी थी - ' रंजिश ही सही, दिल ही दुखाने के लिए आ ' एक ही सफर में प्रेम के दोनों छोर, दोनों किनारे समझ में आ गए- पहले प्रेम और फिर विरह। - और फिर अपना स्टेशन आ गया, जहाँ हम उतर गए।
इसके बाद इतने सालों में वक़्त- बेवक़्त मेहदी की सैकड़ों गज़लें सुनी। रिकॉर्डिंग्स, लाइव कंसर्ट रिकॉर्डिंग और पाकिस्तान की चलताऊ फिल्मों में गाये उनके गाने भी। सब सुना। इस बीच इंटरनेट कैफे पर कई - कई घण्टों डाउनलोडिंग का भी एक लंबा सिलसिला चला। इस पैशन से कई रेयर गज़लें भी इकट्ठा हो गईं। इनमें से बहुत तो याद हो गई, कुछ की सिर्फ धुनें याद है- सैकड़ों सुनना अभी बाकी है। - इतने सालों तक सुनते रहने के बाद अब
भी लगता है जैसे एक बड़ा सा नीला समंदर अपने भरे गले से गा रहा है, शे'र पढ़ रहा है। इतना इत्मीनान और ठहराव, एक पूरी अंधेर रात में सिर्फ एक सांस। पूरी रात जगराता और लगे कि सिर्फ एक आह ली हों। जैसे हम भी धीरे- धीरे जी रहे हों, मेहदी की आवाज के साथ- साथ। जैसे पहाड़, जंगल और समंदर जीते हैं अपनी ही जगहों पर खड़े- खड़े। पहाड़ कहीं नहीं जाता, वहीँ होता है अपनी जगह, फिर भी अपने जीवन में सबसे ऊंचा है, समंदर कहीं नहीं जाता, वह अपनी जगह ही अपने राग और अपने आलाप में बहता है। अरण्य किसी के पास चलकर नहीं जाता, वो हर कहीं नहीं उगता, फिर भी अपने खुद में गहन है- इंटेंस है। मेहदी हसन की आवाज भी वहीँ है, अपने ही होठों पर हलकी सी मुस्कुराती हुई, उन्हीं के अंदर, उस तह में, उनके गले की गहरी सुरंग में- और इस तरफ तुम्हारे मन की अतल गहराइयों में।
दरअसल, मेहदी हसन गाते नहीँ थे, सुनाते थे, जैसे पहाड़ गाते नहीं, फिर भी वे तुम्हे वो सब देते हैं, जो तुम्हे चाहिए -एक अदम्य ऊंचाई, बीते हुए पत्थर, कांटे और फूल भी। प्रेम और विरह का एक इंटेंस जंगल, एक अरण्य। ग़जल सुनने की एक क्लैसिक हाइट।

Sunday, June 18, 2017

जिसे आप देख रहे वो व्यापारी, जिसे मैं देख रहा वो अन्नदाता

- खेतों में बीज बो कर धान उगाने वाला अन्नदाता अन्न की बर्बाद नहीं कर सकता. वो अन्न का एक दाना भी अपने पैरों के नीचे नहीं आने देता है. किसानों की आड़ में एक अदृश्य अराजक अपने काम को अंजाम दे रहा है. - और अगर मैं गलत हूं- वो किसान ही है जो सड़कों पर अन्न बर्बाद कर रहा है, तो फिर वो निश्चित रू प से अराजक हो चुका है, जो पहले कभी नहीं रहा.
- और यह लालबहादूर शास्त्री का किसान तो बिल्कुल भी नहीं है.
मैंने अपने आसपास ऐसे किसान देखे हैं, जो अपने खेत, खलिहान और घर के आसपास बिखरे अनाज के दानों को बिन-बिनकर ढेर सारा अनाज इकठ्ठा कर लेते हैं. जिस जगह आपको एक दाना नजर नहीं आएगा, वहां से बैठे-बैठे वे कई किलो धान इकठ्ठा कर लेते हैं. इस प्रैक्टिस से उनकी कमर झुक जाती है, ज्यादातर किसान अपने बुढ़ापे में झुककर ही चलते नजर आते हैं. अन्न की इस कदर कद्र करने वाला कोई किसान तो क्या, कोई अन्य आदमी भी
अन्न के प्रति इतना रोष नहीं रखेगा.
पानी के टोटे और बिजली की कटौती में रात-रातभर जागकर हल जोतने वाला किसान अपना धान और दूध सड़कों पर नहीं उड़ेलता. वो जानवरों को नहीं मारता, पक्षियों को गोली नहीं मारता. अपने खेतों की फसल को पक्षियों से बचाने के लिए भी वो आदमीनुमा एफिजी का इस्तेमाल करता है. कभी किसी ट्रेन से गुजरते हुए तुमने देखा होगा जीजस क्राइस्ट पक्षियों को डराते हुए खेतों में खड़ा रहता है.
किसान और किसानों की स्थिति को समझने के लिए एक पूरा वर्ग जिस दयाभाव का इस्तेमाल कर रहा है, किसान वैसा नहीं है. वो अपने खेतों को खून से सींचकर अनाज उगाता है. अपना पेट खुद पालता है. इसके विरुद्ध आप और हम उसके धान पर पल रहे हैं. आपकी तरह उसका जीवन चाकरी पर नहीं, वह अपने अरण्य का मालिक है. इसलिए उसे आपके दयाभाव की कतई जरुरज नहीं है.
जो लोग शहरों में रहते हैं, या गांवों से जिनका वास्ता नहीं है, वे किसानों को इस आंदोलन के जरिये उसी दयादृष्टि और हीनभाव से देख रहे हैं. दरअसल, वे जानते ही नहीं कि किसान होता क्या है, यह किस शै का नाम है. सुनिए! ... इस आंदोलन में वो किसान शामिल नहीं है, जो महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश में आत्महत्या कर रहा है. साहूकारों से साल पर जमीन उधार लेकर अपना पेट पालने के लिए उसमें हल चलाने वाला किसान इसमें शामिल नहीं है. जिसके पास आधा बीघा जमीन भी नहीं, ऐसा बे- जमीन किसान इसमें शामिल नहीं है. ऐसे किसान की तो सरकार से 50 हजार रुपए तक कर्ज लेने की औकात नहीं है, वो तो ताउम्र अपने नफे-नुकसान पर ही जीता और मरता है. विरासत में अपनी औलादों को गरीबी सौंप जाता है। फिर भी वो बसें नहीं जलाता, आग नहीं लगाता, मुँह पर कपडा बांधकर पत्थर नहीं फेंकता।
- तो फिर कौन सा किसान इसमें शामिल है. जिसे आप किसान कह रहे हो और मान रहे हो. दरअसल, वह बड़ी दूध डेयरियों का मालिक है. वे सब्जी मंडियों के ठेकेदार हैं. उन्नत खेती के जरिये जो कई हैक्टेयर्स में सब्जियां उगाता है. जिनके पास हैक्टेयर्स में जमीनें हैं, जो अनाज मंडियों के नेता है, पदाधिकारी है. ये साहूकार है, जो धुप में सूख चुकी चमड़ी, पतली टांगों और और पिचके हुए पेट वाले किसानों को अपनी जमीन अदीने पर देते हैं. किसान और मजदूर के बीच का जीवन जीने वाला गरीब आदमी जिनकी जमीनों पर गैहूं, चना और सोयाबीन उगाता है. यह वह व्यापारी है, जिसने ‘अन्नदाता’ शब्द भी भारत के असल किसान से छीन लिया. अब अन्नदाता उसको कहा जाता है, जो गांवों में गरीबों को ब्याज पर बीज देकर उसका खून चूसता है, बीज देने से पहले ही वो धूप में सिकी चमड़ी उतार लेता है। इन सब के बाद भी वो गरीब खेत में बेल की तरह नजर आता है.
आप उसे किसान समझ रहे हैं, जिसने सरकार से कर्ज लेकर चार- चार ट्रैक्टर अपने घर के सामने खड़े कर लिए. नेशनल हाइवेज के पास से गुजरने वाली जमीन जिसने सरकार को करोड़ों रुपए में बेची है, जिसकी कीमत हाइवे बनने- गुजरने से पहले हजारों भी नहीं थी. जिनको सरकारी उपक्रम लगाने के लिए अपनी जमीन के बदले सरकार से करोड़ों रुपए मुआवजा मिल गया है. जिन्होंने जमीनें बेचकर अब मोटरसाइकिल के शोरूम गांवों में खोल लिए हैं. इनके लौंडे जब चाहे मॉल में तफरी करते हैं। यह व्यापारी, साहूकार जो अब भी इस अदृश्य किसानों के नाम पर सरकार से लिए हुए कर्ज की माफी चाहते हैं. दूध के भाव 50 रुपए लीटर करना चाहते हैं, बगैर ब्याज का कर्ज चाहते हैं.
आपका दयादृष्टि वाला भाव अच्छा है, इसे आप अपने पास रखिये, लेकिन जिसे आप इस दृष्टि से देख रहे हैं, ये वो नहीं है. किसान तो दूर कहीं अपने सूखे खेतों में खड़ा आसमान की ओर ताक रहा है बारिशों के लिए ... जिसे आप देख रहे वह व्यापारी है, जिसे मैं देख रहा हूं वह अन्नदाता है, जो अब कहीं नहीं है. किसी की दृष्टि में नहीं. वह अदृश्य है मुख्यधारा के भूगोल से।

Tuesday, June 6, 2017

मिट्टी दा बावा नय्यो बोलंदा

मिट्टी दा बावा नय्यो बोलंदा, 
वे नय्यों चालदां, वे नय्यों देंदा है हुंगारे

अकेलेपन की कोई जगह नहीं होती. वह एक एब्स्ट्रैक्ट अवस्था है. एक उदास अंधेरे का विस्तार. कभी न खत्म होने वाली अंधेर गली. इन अंधेर गलियों को हर आदमी कभी न कभी अपने जीते जी भोगता है. जो भोगता है उसके अलावा शेष सभी के लिए ऐसी गलियां सिर्फ एक गल्प भर होती हैं. एक फिक्शन सिर्फ.

मेरा अकेलापन, तुम्हारा गल्प.

हमारे लिए जो गल्प है, उसी रिसते हुए दुख को जगजीतसिंह ने अपनी आवाज में उतारा. 90 के दशक के बाद जगजीतसिंह ताउम्र अपने बेटे का एलेजी (शोक गीत) ही गाते रहे. उनकी पत्नी चित्रासिंह ने तो इसके बाद गाना ही छोड़ दिया. दरअसल, 1990 में किसी सड़क हादसे में जगजीत-चित्रा के इकलौते बेटे विवेक की मौत हो गई थी. इसके बाद दोनों का साथ में सिर्फ एक ही एल्बम रिलीज हुआ. समवन समव्हेअर. ऐसा कहते हैं कि जगजीतसिंह कई बार घर में ही इस गीत को गुनगुनाया करते थे- और फिर अचानक से चुप हो जाया करते थे. कई बार तुम अपना दुख दूर नहीं करना चाहोगे.
इसके बाद जगजीत-चित्रा जिंदगीभर अपने सूने मकान में, अपने खालीपन में अकेले रहे. वे मिट्टी का पुतला बनाकर दिल बहलाते रहे. हम सब की तरह. हम सब भी अपने दुखों के पीछे एक मिट्टी का पुतला बनाकर रखते हैं/ दिल बहलाने की कोशिश करते रहते हैं. एक ऐसा पुतला जो न बोलता है और न ही चलता. न ही
हुंकारा देता है. / - और फिर किसी दिन पूरी दुनिया तुम्हारे लिए एक पुतलेभर में बदलकर रह जाती है. तुम अपने सूनेपन में और ज्यादा एकाकी हो जाते हो और जिंदगीभर अपने आसपास मिट्टी के पुतले बनाते रहते हो. - कि तुम्हारा दिल लगा रहे.
2003 में मुंबई में जगजीतसिंह के एक लाइव कंसर्ट में उन्हें पहली बार सुना था. उन्होंने गाया था मिट्टी दा बावा नय्यो बोलदा... वे नय्यो चालदा ... वे नय्यो देंदा है हुंकारा. यह गीत चित्रासिंह ने किसी पंजाबी फिल्म में गाया था. इसके बाद शायद यह गीत दोनों के लिए एलेजी बनकर रह गया. अपने बेटे का शोकगीत. एक हरियाणवी लोकगीत की पंक्ति याद आ रही है. ‘ किस तरयां दिल लागे तेरा, सतरा चौ परकास नहीं ’ (कहीं भी रौशनी नहीं है, चारों तरफ अंधेरा ही अंधेरा पसरा है. मैं तेरे लिए ऐसा क्या करुं कि इस दुनिया में तेरा दिल लगा रहे)
जिस गीत को चित्रासिंह ने पंजाबी फिल्म में गाया, उसे बाद में जगजीतसिंह ने अपने कई कंसर्ट में गाया. - जैसे रुंधे गले से वे अरज लगा रहे हो कि मिट्टी का बावा बोलने लगे, चलने लगे.
हम सब का एक शोकगीत होता है. जिसका नहीं है, वे इस गीत को सुनकर रो सकते हैं/ दहाड़ मार सकते हैं. यह सुनकर हम एतबार कर सकते हैं कि दुख सिर्फ आंखों से ही नहीं रिसता. तुम्हारी त्वचा की रोमछिद्र से भी बहुत... दरअसल, बहुत सारा दुख छलक सकता है.
‘ मिट्टी दा बावा मैं बनानी हा
वे झाका पांडी हा
वे उठी देंडी हा खेसे
ना रो मिट्टी देया बाबेया
वे तेरा पियो परदेसी
मिट्टी दा बावा नय्यो बोलंदा
वे नय्यों चालदां
वे नय्यों देंदा है हुंगारे
ना रो मिट्टी देया बाबेया
वे तेरा पियो बंजारा
कित्थे ता लावा कलियां
वे पत्ता वालियां
वे मेरा पतला माही
कित्थे ता लावा शहतूत
वे मेनू समझ न आवे ’

Tuesday, May 30, 2017

- गायें जो तुम्हारे जीवन में हैं,

- गायें जो तुम्हारे जीवन में हैं,
बचपन में माँ उपले बनाती थी। गाय के गोबर के कंडे। फिर घर की दीवारों और ओटले पर उन्हें थेफती थी। घर की कई दीवारें उपलों से भर जाती। जब उपले सूख जाते तो उनका इस्तेमाल घर का चूल्हा जलाने के लिए होता था। उपले थेपते माँ के हाथ उसकी चूड़ियों तक गोबर से सन जाते, फिर वो जब अपने बाल को पीछे धकेलती तो उसके मुंह पर उसके गाल पर भी गोबर लग जाता। बचपन में वो भी गाय के गोबर के साथ खेलता, मिट्टी और गोबर के साथ खेलता हुआ ही बड़ा हुआ। कभी- कभी थोड़ा गीला गोबर उठा लेता और वो भी माँ की तरह उपले थेपता। उसके दोस्त भी इस शग़ल में साथ हो जाते, गोबर से खेलते। फिर दांव लगता। शर्त लगती। किसका उपला सबसे ज्यादा गोल। किसका उपला चाँद जैसा। तेरे उपले की नाक छोटी है। रात को रसोईघर में चूल्हे के सामने हम उसी उपले की सुर्ख़ आंच को देखते। हम अपने जीवन की लौ को ताकते। उसी गर्माहट से आत्मा पिघल जाती। ठंड के दिनों में तो गोबर के अंगारों और चूल्हे की तपन के बीच पूरी देह में आत्मा उग आती और हम उसे पूरे शरीर से झरता हुआ देखते रहते। हम अपने पिता के साथ भविष्य की उन सारी बुरी आशंकाओं को उसी चूल्हे की आग में जलाकर दफ़्न कर देते। सूखे उपलों को अंगारों में तब्दील होने के बाद हम उन पर रोटियों के गुब्बारे उड़ते देखते। काले और कत्थई धब्बों वाले सफ़ेद और गेंहुआ गुब्बारे। हम गोलाइयाँ देखते। माँ के हाथ से बेली गई गोल रोटियां और उपलों की गोलाइयों का अंतर नापते। दोनों के बीच कोई संबंध नहीं- जमीन में उगा गेहूं और गाय का गोबर। फिर ये क्या रिश्ता है। कौनसी संस्कृति का हिस्सा है- जानवर के पेट से निकलने वाले गोबर और मनुष्य के पेट के अंदर जाने वाले अन्न के बीच कौनसा संबंध है। ये किस संस्कृति का हिस्सा रहा है। ये कौनसी परम्परा है। जिसकी आंच में हम सदियों से अपनी देह को तपाते और आत्मा को सींचते आ रहे हैं। चूल्हे की आंच में पिघलते उपले की आग में क्यों हमारे चहरे का खून हमेशा दमकता रहता। जले हुए कंडों की राख भी सुबह हम अपने माथे पर घिस लेते हैं। हथेली पर रखकर हम भभूति की फक्की मार लेते। ये संस्कृति राख हो जाने तक हमारा पीछा नहीं छोड़ती।
गौ के गोबर से हमारा- तुम्हारा रिश्ता खत्म क्यों नहीं होता - सोलह श्राद्ध में हमारे- तुम्हारे घर की कुंवारी बेटियां हर शाम को दीवारों पर संजा बनाती है, सोलह दिनों तक संजा गीत गाती। शाम होते ही गोबर के चाँद- तारे घरों की दीवारों पर दमकते लगते। ये चाँद- सितारे हमारे लिए आसमान के चाँद- तारों से भी सुंदर होते। श्राद्ध के इन्हीं दिनों में, सुबह हम देखते हैं कि हमारे पुरखों की आत्मा गाय के इसी गोबर की आंच और लौ में तृप्त हो रही है। गुड़ और घी का धूप हमारे पूरे जीवन- नगर को महका रहा। सींच रहा है। पोस रहा है। हम देखते हैं - धूप की गंध हर सीमा को पार कर के यहाँ- वहां पसर रही है।
इस संस्कृति का राजनीति से कोई वास्ता नहीं है, हमे अब भी राजनीति समझ नहीं आती। सनद रहे हम अब भी राजनीति की बात नहीं कर रहे हैं। बात मानवता की है। बात देस की ख़ुश्बू की है- जो तुम्हारे और हमारे मन और आँगन में रची बसी है। इस ख़ुश्बू के लिए तुमने कभी कोई पौधा नहीं उगाया। देस की ख़ुश्बू को महसूसने के लिए तुमने कभी कोई फूल नहीं खिलाया। मिट्टी किसी वृक्ष का पौधा नहीं। वो कोई फूल नहीं। फिर भी महकती तो है। इसकी महक हमारे- तुम्हारे इर्दगिर्द है। तुम्हारे आँगन में और दीवारें अब भी तुम्हे इसका अहसास तो दिलाते होंगे। चूड़ियों तक गोबर से सने अपनी माँ के हाथ तुम्हे याद तो होंगे, याद तो आते ही होंगे।
"जो भी भारत को अपना देश मानता है, उसे गाय को अपनी माँ मानना चाहिए" पता नहीं क्यों झारखण्ड के मुख्यमंत्री रघुबर दास का यह स्टेटमेंट मुझे बार- बार आकर्षित करता है, इस वाक्य के टेक्स्ट के भीतर का चार्म मुझे अपनी ओर खींचता है। बिटवीन द लाइन इसका एसेंस मुझे समझ आ रहा है। इसमें एक ख़ुश्बू महकती है। हो सकता है राजनीति से प्रेरित होकर उन्होंने यह कह दिया हो। या शायद गलती से- लेकिन हम और तुम गोबर के अंगारों और उसकी आंच को अलग नहीं कर सकते- अलग देख भी नहीं सकते। तुम अपने स्वयं के विचार को खुद से अलग नहीं कर सकते। रोटी और उपलों के बीच कोई संबंध नहीं। लेकिन इन दोनों से तुम्हारा तो कोई रिश्ता कभी रहा होगा। अपनी माँ के कहने पर तुमने कभी तो गाय को पहली रोटी खिलाई होगी। ... तो गाय इसलिए तुम्हारी माँ नहीं हो गई कि तुम उसे पवित्र मानते हो। वो माँ है ही नहीं। वो माँ हो भी नहीं सकती क्योंकि उसके लिए तुम्हे बेटा होना पड़ेगा और तुम तो अपने खून की माँ के भी अब बेटे नहीं रहे। --- क्योंकि - तुम गाय काटकर खाते हो। गाय सिर्फ एक पशु है। कभी तुमने उसे रोटी खिलाई हो इसलिए वो माँ नहीं बन जाती। ठीक उसी तरह जैसे कुत्ते को रोटी देने पर वो तुम्हारा बाप नहीं हो जाता। तुम गाय को माँ मान ही नहीं सकते। गाय उनकी भी माँ नहीं जो उसे काटते हैं और उनकी भी नहीं जो उसकी रक्षा कर रहे हैं। तुम और हम, हम सब जो बचपन में उपलों से खेला करते थे किसी भी गाय की कोख से नहीं जन्मे, इसलिए उसका खून तुम्हारे अंदर नहीं है। लेकिन उसका दूध तो जरूर तुम्हारी रगों में दौड़ रहा होगा। अपने घरों को पवित्र करने के लिए तुम अब भी उसका मूत्र घरों में छिड़कते होंगे। गायों की तलाश में चौराहों पर जाते होंगे। इसी के कंडों की आंच से उठने वाले धुंए में पुरखों की अतृप्त आत्माएं घुलमिल जाती होगी। खून न सही उसका गोबर तुम्हारा है। - और उसका दूध भी। जाने और अनजाने।
तुम जानवरों को, पशुओं को भी मनुष्य से ... अपने से, खुद से अलग नहीं कर सकते ... चाहकर भी और अनजाने में भी। ... तो यह रिश्ता ही बरकरार रहने दो, मनुष्य और गोबर का रिश्ता। चाहकर या अनजाने में। अपनी गाय से ... अपनी माँ से या अपने पशु और अपने जानवर से। मेरा रिश्ता हो सकता है, गाय से न हो लेकिन उसके गोबर से है, यह मैं जानता हूँ। गाय तुम्हारी माँ नहीं, जानवर है, लेकिन उसके दूध से, इस जानवर के गोबर और मूत्र से तो तुम्हारा कोई रिश्ता होगा। ये संस्कृति। गोबर की संस्कृति राख हो जाने तक हमारा पीछा नहीं छोड़ती। हमारे भी राख हो जाने तक पीछा नहीं छोड़ती ... नहीं छोड़ेगी।

Saturday, May 13, 2017

जस्टिन ड्रयु बीबर और हम सब

शास्त्रीय संगीत की महफिलों को सजाने के लिए जर्जर और लगभग ढह चुके सभागारों के लिए भी मिन्नतें करना पड़ती हैं। नेताओं के हाथ- पांव जोड़कर उन्हें अतिथि बनाया जाता है। जैक लगाकर टैंट हाउस वालों से दरी और लाल कुर्सियां जुगाड़ना पड़ती हैं। टिकट तो दूर प्रवेश पत्र भी इन महफिलों को नसीब नहीं होता। इतनी कुश्ती के बाद कुछ चार- छह सुनकार महफिलों में  मक्खियां मारते हैं। ऊंघते हैं। दरी से कचरा बिनते हैं। कुछ दरख़्त ऐसे होते हैं जो ठुमरी पर हाथ नचाते हैं। राग पर बैराग हो जाते हैं। इन पके दरख़्तों में से कुछ को तो को चाय बिस्किट भी नहीं मिलते। ग्वालियर घराना से लेकर किराना घराना तक। आगरा घराना से लेकर इंदौर घराना तक। जयपुर अतरौली से लेकर रामपुर सहसवान तक। कोई ठुमरी नहीं सुनता। कजरी- चैती तो दूर कोई ख़याल नहीं दोहराता। किसका विवाह। कौन छन्नू लाल मिश्र। किशोरी अमोनकर मरी तो पहचानी गई। यहाँ मुकुल शिवपुत्र बेख़याल है। राशिद खान गुमनाम हैं। कौशिकी चक्रवर्ती बम्बई तरफ निकल रही हैं। पुरनसिंह कोटी के बेटे मास्टर सलीम दिल्ली के जगरातों में हैं। कबीर के झांझ मंजीरें सिर्फ गाँवों की आवाजें हैं। निर्गुणी मालवा के बाहर नहीं जा पा रहे। भैरवी तो इतना भी रेअर नहीं। ध्रुपद तो दूर है - और गंभीर है।

जस्ट इन - जस्ट आउट
उधर सुना है- एक 23 साल का लौंडा जस्टिन बीबर बम्बई को ठग गया। जस्ट इन एंड जस्ट आउट। बॉस्केट बॉल शॉर्ट्स पहनकर आर एंड बी रहा था। (आर एंड बी एक सिंगिंग स्टाइल है - यह फंक, सोल, पॉप, हिपहॉप और रिदम ब्लूज़ का कॉम्बिनेशन होता है ) इसी जॉनर के लिए जस्टिन बीबर जाना जाता है।  भारत के 60 परसेंट बिलो 21 कूल डूड बीबर के दीवाने हैं - लेकिन वो शॉर्ट्स पहनकर लिप्सिंग कर गया। कूल डूड की तो बात ठीक है - यह उनका लाइफस्टाइल है। इस उम्र की उनकी अपनी चॉइस है। लेकिन उन इंटेलेक्टुअल्स का क्या जिन्होंने 50 हज़ार / 75  हज़ार का टिकट लिया था। उस बॉलीवुड का क्या जो बाहें पसारकर उसके साथ सेल्फी लेना चाहता था।    

- तुम्हारा ही गाना गाना चाहता हूँ बीबर - ' व्हाट डू यू मीन ' जस्टिन ?  नाउ से ' सॉरी ' टू इंडिया। कूल डूड तुम भी जस्टिन को सॉरी कह सकते हो।       

Friday, May 12, 2017

ट्रैन


निश्चित नहीं है होना 
होने का अर्थ ही है - एक दिन नहीं होना 
लेकिन तुम बाज़ नहीं आते
अपनी जीने की आदत से 

शताब्दियों से इच्छा रही है तुम्हारी
यहाँ बस जाने की
यहीं इसी जगह 
इस टेम्परेरी कम्पार्टमेंट में 

तुम डिब्बों में घर बसाते हो
मुझे घर भी परमानेंट नहीं लगते

रोटी, दाल, चावल
चटनी, अचार, पापड़
इन सब पर भरोसा है तुम्हे

मैं अपनी भूख के सहारे जिंदा हूँ

देह में कीड़े नहीं पड़ेंगे
नमक पर इतना यकीन ठीक नहीं

तुम्हारे पास शहर पहुंचने की गारंटी है
मैं अगले स्टेशन के लिए भी ना-उम्मीद हूँ

तुम अपने ऊपर
सनातन लादकर चल रहे हो
दहेज़ में मिला चांदी का गिलास
छोटी बाईसा का बाजूबंद
और होकम के कमर का कंदोरा
ये सब एसेट हैं तुम्हारी 
मैं गमछे का बोझ सह नहीं पा रहा हूँ

ट्रैन की खिड़की से बाहर
सारी स्मृतियां 
अंधेरे के उस पार
खेतों में जलती हैं 
फसलों की तरह

मुझे जूतों के चोरी होने का डर नहीं लगता
इसलिए नंगे पैर हो जाना चाहता हूँ

सुनो, 
एक बीज मंत्र है
सब के लिए
हम शिव को ढूंढने
नहीं जाएंगे कहीं

आत्मा को बुहारकर
पतंग बनाई जा सकती है
या कोई परिंदा

हालांकि टिकट तुम्हारी जेब में है
फिर भी एस-वन की 11 नम्बर सीट तुम्हारी नहीं
इसलिए तुम किसी भी 
अँधेरे या अंजान प्लेटफॉर्म पर उतर सकते हो

नींद एक धोखेबाज सुख है
तुम्हारी दूरी मुझे जगा देती है

समुद्री सतह से एक हज़ार मीटर ऊपर
इस अँधेरे में
मेरा हासिल यही है
जिस वक़्त इस अंधेर सुरंग से ट्रैन
गुजर रही है
ठीक उसी वक़्त
वहां समंदर के किनारे
तुम्हारे बाल हवा में उलझ रहे होंगे
तुम्हारे हाथों पर 
खारे पानी की परतें जम गई होगी
कुछ नमक
कुछ रेत के साथ 
तुम चांदीपुर से लौट आई होगी। 

Tuesday, April 25, 2017

आंखें उसकी


उदासी में भींजे हुए फाहे
कोई रख जाए सिरहाने तुम्हारे
तुम देखना आँखें उसकी

जब दीवारों पर ओझल होने लगे
उसके पीठ के निशान कहीं 
तुम देखना आँखें उसकी 

और शाम का आखिरी अंधेरा 
उसकी शक्ल में डूबने लगे जब
तुम देखना आँखें उसकी

गर्मी की इन बोझिल दोपहरों से
जब तुम्हारा साथ छूट जाए
जब कोई किताब भी तुम्हारी टेबल पर न हों
तुम देखना
उसकी उंगलियों के बीच जो जगह है
वो तुम्हारे लिए है

दुनिया जब तुम्हे खींचकर 
कुफ़्र की ओर ले जाए
तुम देखना 
पूरब में उसका घर है

गर्मियों के आखिरी दिनों में
बारिशों से कुछ दिन पहले
जब तुम्हारी आँखों में
ठहर जाए बहुत सारा समंदर
जब बादलों का खाली हाथ लौटना रह जाए
तुम देखना आँखे उसकी

जब पैर रखने के लिए 
कुछ बचा न हो पृथ्वी पर 

तुम याद रखना

तुम्हें लिखने के लिए हमेशा जगह देती रहेगी

तुम बस देखना,
आंखें उसकी।



Thursday, December 22, 2016

उसकी चुप्पी

उसकी चुप्पी से खुलते हैं शहर
गहरी खाई से ऊबकर आते हैं सवेरे 

उजली हंसी में उगता है दिन 

उसकी उंगलियां रफ़ मसौदा लिखती हैं
संवलाई हाथ बातें करते हैं 

मोत्ज़ार्ट की धुन पर
ऊंघती हैं उदास दोपहरें 

दिन अपनी धूप को सरकाता हैं
धीमे धीमे शाम की तरफ 

रात तब्दील हो जाती है
अपने मिज़ाज़ में 

सख़्त नींदें झुकती नहीं
फिर भी बिस्तरों की तरफ 

वो कोई हैरत सुनना चाहती है
मुझे आसान नींद पसंद नहीं

पवनचक्कियां बहती हैं
पहाड़ों पर जहां
वहीं, उसकी आंख के एक छोर पर हूं मैं 

वो अपने होठों पर नमी चाहती हैं
मैं उसके माथे का तिल देखता हूं बार बार।

Sunday, October 23, 2016

मुकुल शिवपुत्र : हाल मुकाम कहीं नहीं।

ठुमरी सुनी। ख़याल भी। इंदौर और देवास में स्टेज के सामने दरी पर बैठकर घण्टों सुना और जी भर के देखा भी उन्हें। लेकिन इन आयोजनों के दीगर कभी पकड़ में नहीं आए। बहुत ढूंढा। जुगत लगाई कि भजन खत्म होते ही पीछे के रास्ते से जाकर पकड़ लूंगा, लेकिन ग्रीन रूम के दरवाजे से निकलकर पता नहीं कब और कहाँ अदृश्य हो जाते थे। अक्सर यही हुआ। भजन गाकर निकलते ही या तो लोगों ने घेर लिया या अचानक से कहीं गायब हो जाते।
कई महीनों बाद एक दिन पता चला कि होशंगाबाद में रेलवे स्टेशन के आसपास घूमते नज़र आए हैं। सफ़ेद मैली धोती- कुर्ता पहने और गमछा डाले। निर्गुण पंडित कुमार गंधर्व के बेटे मुकुल शिवपुत्र। अधपकी दाढ़ी। तानपुरा कहीं दूर रखा है, जो बेहोशी में भी उनकी नज़र के घेरे में है। कोई कहता बीमार हो गए हैं- किसी ने कहा लड़खड़ा रहे हैं। पैर पर नहीं खड़े हो पा रहे हैं। मन हुआ कि चले जाऊं, लेकिन हिम्मत नहीं हो सकी- यह तय था कि जब तक इंदौर से होशंगाबाद पहुचेंगे, वे अदृश्य हो चुके होंगे। मामला उस दिन वहीँ दफा कर दिया। अच्छा भी हुआ- नहीं गए, अगर जाते तो संगत तो दूर रियाज़ भी कानों में नहीं पड़ता। अगले दिन खबर में थे कि भोपाल वालों ने उन्हें उठा लिया है। भोपाल में ख़याल केंद्र खोलेंगे और वहीँ रखेंगे। यह भी सिर्फ एक ख़याल ही रह गया।
फिर किसी दिन पता चला कि नेमावर में है नर्मदा किनारे। किसी बाबा की कुटिया में धुनि रमा रहे हैं। वहीं डेरा जमाया है। रात के अँधेरे में गौशाला के बाजू में बैठेते हैं। वहीं अँधेरे में भांग घिसते- घोटते हैं और कभी- कभार मन होता है तो गा भी लेते हैं। घाट से सटी उस कुटिया से तानपुरे और आलाप की हल्की खरज नर्मदा किनारों से टकराती है। किनारों के साम- सूम अंधेरे और नदी का संवलाई उजारा पंडित जी के उस रियाज का अभी भी गवाह होगा। शायद उस समय उन्होंने कुछ देर के लिए ही सही, नर्मदा किनारे अपना गाम बसाया हो।
फिर एक दिन भनक लगी कि हमारे पिंड इंदौर में ही हैं। एक अखाड़े में रह रहे हैं। उस दिन भी खूब ढूंढ़ा। पता लगाया कि कौनसा अखाड़ा है। किस मोहल्ले में हैं, किस उस्ताद को अपना चेला बना रहे हैं। कुछ नाम सुनने में आए- कल्लन गुरु व्यायामशाला। सुदामा कुटी व्यायामशाला या बृजलाल उस्ताद व्यायामशाला। इनमे से वे कहीं नहीं थे। दो- तीन दिन बाद पुख्ता सबूत मिले कि बड़ा गणपति के आगे पंचकुईया आश्रम में हैं। यहीं दाल बाटी खा रहे हैं। हनुमानजी के मंदिर के सामने। पंचकुईया अपने घर से दूर नहीं था। करीब पांच- छह किलोमीटर की दूरी पर बस। गाड़ी उठाकर निकल गए। बगैर देर किए चप्पल पहनकर। शाम का धुंधलका छा गया था। इंदौर का धुआं और धूल आदमी को फ़क़ीर बना देती है। घर से चप्पल पहनकर निकल जाओ तो खैरात में मिलने वाली इंदौर की धुंध-धूल से आदमी खुद को आधा कबीर महसूस करने लगता है। शाम साढ़े सात बजे पंचकुईया पहुँचे तो आरती की ध्वनि थी। घी के फाहों में भींजे दीयों में आग महक रही थी। सफ़ेद और भगवा धोती में अध् भींजे पुजारी स्तुति गान में थे। संध्या आरती और हनुमान चालीसा के पाठ की करतल ध्वनियां। अपना मन नहीं था लेकिन स्तुति में। फिर भी आरती खत्म होने तक इंतज़ार करना पड़ा। बीच- बीच में यहां- वहां देखते रहे। ताली बजाते हुए इधर- उधर नज़र फेरते रहे। किसी कुटी में कहीं नज़र आ जाए शिवपुत्र। कहीं से रियाज की या किसी आलाप की आवाज आ जाए। लेकिन सूना ही नज़र आया आश्रम। आरती खत्म होते ही पूछा किसी से- जवाब मिला जानकी महाराज से पूछ लो, उनको पता होगा। जानकी महाराज को ढूंढा तो वो अपने गमछे धो रहे थे। गमछों से उनके पानी झारने और सुखाने तक उनका इंतज़ार किया। फटका मारकर अपने कमरे से बाहर आए तो उनसे पूछा- पंडितजी कहाँ बैठे हैं। उन्होंने बताया कलाकार आए तो थे, लेकिन दोपहर में चले गए। दिल बैठ गया। हमने तस्दीक करने के लिए फिर पूछा- आप जानते हैं ना मैं किनके बारे में पूछ रहा हूँ - जवाब था, हां ! महाराज, शिवपुत्र आए थे, लेकिन चले गए। एक गाड़ी आई थी बैठकर चले गए। दो दिन यहीं भांग खाई, भजन गाये और आटा भी गूंथा। मैं समझ गया कि पंडितजी चले गए यहाँ से भी। थोड़ी- थोड़ी बदरंगी और बेरुखी के साथ लौट आए।
यह पंडितजी की ठुमरी और उनकी ख्याल गायकी से दीगर उनकी कबीरियत की संगत और उसे जानने के करतब थे, जो कभी कामयाब नहीं हुए। मौसिकी से परे उनकी बेफिक्री से हर किसी का राब्ता रहा है। मेरा कुछ ज़्यादा ही। बीच में एक सुर का अदृश्य तार तो जुड़ा ही रहा हमेशा, लेकिन संगत अब तक नहीं हो पाई। रियाज और आलाप तो बहुत दूर है। इसी बीच मुम्बई से कुछ फिल्म मेकर भी आये थे- वो पंडितजी पर डॉक्युमेंट्री बनाना चाह रहे थे। इस बहाने भी हमने उनको खूब खोजा-पूछा। देवास टेकरी पर 'माताजी के रास्ते' पर भी पूछा-ताछा। उनकी खोज में मुंबई वालों की मदद करने का मन कम और अपनी मुराद पूरी करने का इरादा ज्यादा था- इसलिए नेमावर से लेकर दिल्ली तक फोन लगाए, भोपाल भी पूछा, लेकिन कुछ नहीं हो सका।
फिलहाल मैं नागपुर में हूँ- उनका सुना है कि वे पुणे में हैं, लेकिन हमें अपने प्रारब्ध पर यकीन कुछ कम ही है - इसलिए वहां पुणे भी नहीं जा रहे। क्या पता वहां से भी भांग दबाकर कहीं रफूचक्कर हो जाए पंडित जी।
- मुकुल शिवपुत्र हाल मुकाम कहीं नहीं।

Wednesday, October 12, 2016

उंगलियां

उसकी आखों के जीने से
भीगकर
उतरकर आया
अमावस्य का पूरा दिन

दृश्य- अदृश्य
छाया और रौशनी
नदी के ठंडे किनारे
उँगलियों के पोर उसके
बर्फ की परतों से हाथ

पूरी हथेलियों का होना हथेलियों में
पूरी उँगलियों का होना उँगलियों में
उलझना, खुलना,
खुलते जाना

फिर जीना उनका
हमने
हम दोनों ने
एक घर बनाया
धागे बुने
हाथ जोड़े
प्रार्थनाएं की
गोल- गोल घेरे बनाए
अंगूठियों की तरह घूमी पृथ्वी
उसके मन के फेरे लगाए
उँगलियों में उलझकर
सुलझ गई नियति
उसके कंधों पर थमी
तो आसान हो गई जिंदगी।

अक्टूबर 12, 2015

Sunday, September 25, 2016

सितंबर

सारी लड़कियां सितंबर में पैदा नहीं होती 
इसलिए उनके पास स्कार्फ़ नहीं होता 

बालों में भीनी- गहरी ख़ुश्बू भी नहीं
आंखों में खार
दिल में ख़्याल
बे- ख़्याल ऐसा नहीं होता 

जहां सड़कें और पहियें रोज मिले
रोज जियें, रोज मरे 
यात्राओं के बगैर रहने वाले
एबॉन्डन रेलवे स्टेशनों की तरह 
उन लड़कियों के शहर
ऐसे नहीं होते 
दुनिया के आखिरी शहरों की तरह 

दरगाह का इत्र महके जहां
दोपहरें और शामें
कभी इतनी सख़्त
कभी इतनी नर्म नही होती 

अब रातों में कहाँ उतनी रातें
अंधेरों के पास नहीं अंधेरा घना

मैंने अपने हाथ में कभी इतनी अर्जियां नहीं रखीं
और पैरों में लम्बे इंतज़ार नहीं पाले 

मैं अकेले में इतना मुस्कुराया नहीं
इतना रोया भी नहीं कभी 

सारी लड़कियां सितंबर में पैदा नहीं होती
इसलिए उनके पास स्कार्फ़ नहीं होता 

बालों में भीनी- गहरी ख़ुश्बू भी नहीं 
आंखों में खार
दिल में ख़्याल
बे- ख़्याल ऐसा नहीं होता 

उनके पास एक गली
कुछ सड़कें और कुछ इमारतें नहीं होती 

सारी लड़कियों के पास
मीठा नीम शरीफ़ की पत्तियां नहीं होती 

फिर एक दिन उसने
मेरे हाथ पर एक शहर का नाम कुरेद दिया
तब से मेरे पास दो शहर हैं
और दो ख़्याल भी
एक उसका
और दूसरा भी उसी का 

बहुत सालों बाद
जब हम
हम मतलब 'हम दोनों'
मर जाएंगे 
जब उम्र तुम्हारी कमर पर झुकने लगेगी
तब सितंबर की ऐसी ही किसी रात में
मैं बारिश से तुम्हारी उम्र पूछूंगा 
और इन सभी बीते सालों से
पूछूंगा मेरी आह का असर 

तब आख़िरी सांस के पहले
एक हिचकी लूंगा
फिर तुम्हारा नाम

इस तरफ सरकती
धीमी और ठंडी मौत से पहले
कोशिश करूंगा जानने की 
प्यार मैं कौन था
मैं या तुम.

Sunday, September 18, 2016

जहाँ रुदन था अंतिम

फिर भी तुम नहीं लिख सके
नहीं पहुँच सके वहां
जहां गर्दन पर
नली के ठीक ऊपर
सांस के आरोह-अवरोह के बीच
तेज़ और चमकदार धार रखी है
धूप की तरह उजली
और गर्म
उस वक़्त कहीं नहीं होती हैं आँखेँ
बैगेर लड़खड़ाए
कुछ ही क्षण में
रक्त अख्तियार कर लेता है खंजर
पृथ्वी ने भी देखा
वह दृश्य लाल अपनी छाती पर
फिर भी तुम नहीं लिख सके
नहीं पहुँच सके वहां
जहाँ रुदन था अंतिम

Monday, July 25, 2016

मैं अब वहीं हूँ

मैं अब वहीं हूँ
उसकी आँख के एक छोर पर

पहाड़ों पर फिरकती
पवनचक्कियों में

चलती हुई
लेकिन कहीं नहीं पहुँचती हुई

उसके होंठ के किनारों में हूँ
सूखते नहीं, जो भीगते भी नहीं

मैं वहां नहीं हूँ, यहाँ भी नहीं
कहीं भी नहीं

अपनी आत्मा की तरह
जिंदा भी नहीं, मृत भी नहीं

बगैर दीवारों के मकान
जिनके दरवाजें नहीं, दस्तकें भी नहीं

उन रास्तों में हूँ
चलते नहीं, जो ठहरते भी नहीं

सड़क के पीले और सफ़ेद लेम्पोस्ट की तरह
जिनकी रोशनियों से कुछ छटता नहीं

पतंगे छटपटा कर मर जाते हैं जहाँ
ऐसे चौराहों को हासिल जहाँ कुछ भी नहीं

मैं वहीं कटूंगा धीरे- धीरे
जहाँ छोड़ा था तुमने
जिसे तुम पहला या अंतिम सिरा कहती थी
वहीं अपने घावों को देखूंगा
सुख में बदल जाने तक

मुझे मनाने की कोशिश मत करना
मैं सीख गया हूँ अब
नहीं लिखना - कुछ भी नहीं लिखना

अब मैं सिर्फ देखूंगा
अपना जीना, अपना मरना।

Saturday, July 16, 2016

वहीं,


वहीं,
मौत सी उसी ठंडी खामोश नींद में
मिलना मुझसे

या फिर नर्क में।
तुम जिंदगी से निहारना
और मैं अपनी मौत से झाकूंगा तुम्हे 

वहीं 
मौत सी उसी ठंडी ख़ामोश नींद में 
मिलना मुझे

या फिर कोई जगह तय कर बता देना
जहां तुम रहती ना हो 
या जहां मैं पहुंच न सकूँ 

Monday, June 20, 2016

सेमिनरी हिल्स

धरमपेठ के अपने सौदें हैं
भीड़ के सर पर खड़ी रहती है सीताबर्डी

कहीं अदृश्य है
रामदास की पेठ

बगैर आवाज के रेंगता है
शहीद गोवारी पुल
अपनी ही चालबाजियों में
ज़ब्त हैं इसकी सड़कें

धूप अपनी जगह छोड़कर
अंधेरों में घिर जाती हैं

घरों से चिपकी हैं उदास खिड़कियां
यहां छतों पर कोई नहीं आता

खाली आंखों से
खुद को घूरता है शहर

उमस से चिपचिपाए
चोरी के चुंबन
अंबाझरी के हिस्से हैं

यहां कोई मरता नहीं
डूबकर प्यार में

दीवारों से सटकर खड़े साये
खरोंच कर सिमेट्री पर नाम लिख देते हैं

जैस्मिन विल बी योर्स
ऑलवेज ..
एंड फॉरएवर ...

दफ़न मुर्दे मुस्कुरा देते हैं
मन ही मन

खिल रहा वो दृश्य था
जो मिट रहा वो शरीर

अंधेरा घुल जाता है बाग़ में
और हवा दुपट्टों के खिलाफ बहती है

एक गंध सी फ़ैल जाती हैं
लड़कियों के जिस्म से सस्ते डिओज की

इस शहर का सारा प्रेम
सरक जाता है सेमिनरी हिल्स की तरफ।

Saturday, June 18, 2016

कभी यूं भी तो हो


कभी यूं भी तो हो 

चलने की आहटें जहां 
वहीँ तुम्हारी आंख के किनारों पर शाम
उंगलियों के पोर में दोपहरें हो

रात गुजरे महक कर
सुबह शीशे की परी हो

रोज सुबह काजल से
खींचों किनारों पर मुझे
रात उतारो आंखों से लेंस की तरह

उस आधे अंधेरे वाली हथेलियों
उड़ते स्कार्फ़ की तरह जिंदगी हो

इन सारे अंधेरे कमरों में
तुम्हारे उजाले गश्त करें

पत्ते टूटे पेड़ से
उम्र टूटकर यूं झरे।


Sunday, February 14, 2016

ज़्यादातर दोष आँखों का है

ज़्यादातर दोष आँखों का है
घूम-फिर कर
सारी दुनिया वहीँ लौटती है।
आँख किनारे
तुम्हारे आईलाइनर की हद पर
हलकी नमी में
काजल घुलकर तिर जाता है जहाँ
वहीँ घट और घाट है।
गहरे, काले- कत्थई
डार्क सर्कल में
जहाँ पूरे साल के रतजगे जमा हैं
वहां भी एक दुनिया मौजूद है।
तन की ख़ुश्बू
और मांसल आकांक्षा से परे
प्रेम की अज्ञात खोह में भी
एक दुनिया रवां है।
तुम्हारी दोनों हथेलियों को जोड़ने पर
त्रिभुज के बाजू में
जो बीज बनती है
वहां भी दुनिया संभव है।
गोयाकि कुछ नुक्स
उस पहली कविता के हैं
और तुम्हारे हेयर ड्रायर के भी
जो तुम्हारे बालों की हिदायत नहीं सुनते
इसलिए मेरे कंधों पर उलझते रहे हर शाम।
मैं डूबने के लिए
मरने के लिए
तुम्हारी आँखों के किनारे चुनता हूँ।
आँख किनारे
तुम्हारे आईलाइनर की हद पर
हलकी नमी में
काजल घुलकर तिर जाता है जहाँ
वहीँ घट और घाट है।

Saturday, October 3, 2015

आँगना तो पर्बत भयो, देहरी भयी बिदेस

... हर शाम को ठुमरी की, धीरे- धीरे, टूटी हुई धुन बहती है. बाबुल मोरा नैहरवा छूटा ही जाए. हर शाम को एक जर्जर आवाज में इस ठुमरी के टूटे लफ्ज कान में आ गिरते थे ... जैसे कोई गुनगुनाते- गुनगुनाते हुए अपना सामान समेट रहा हो। जैसे कहीं जाने के लिए कोई सूटकेस में अपने कपड़ें जमा रहा हो, जाने की तैयारी कर रहा हो। फिर एक दिन तीसरी मंज़िल के उस कमरे का वह कौना खाली हो जाता है. कुर्सी खाली हो जाती है, दरअसल जगह सूनी हो जाती है। जिस जगह से शंकरगढ़ के पहाड़ नजर आते थे, जहां से पहाड़ पर खड़ी पवनचक्कियां हवा के साथ बहती थीं, और हम कई बार खाली दोपहरों में पवनचक्कियों और पहाड़ों की बातें किया करते थे। हम सब की आँखें खिड़कियों से बाहर अक्सर उतनी ही दूर होती थी। खिड़कियां दिन ब दिन माफियाओं की कुल्हाड़ी से कटकर और घटकर छोटे होते पहाड़ों को देखती थीं, उनके साथ बातें किया करती थीं। उन खिड़कियों से शहर का वो सालों पुराना बड़ा स्तंभ भी नजर आता था। जिसका दरवाजा कभी बंद नहीं होता। पूरे शहर के लोग उस दरवाजे के आर-पार जा सकते थे. सड़क से गुजरते दूसरे शहरों के लोग उसकी ऊंचाई नापते रहते थे, उसकी उम्र की टोह लेते थे। उस दरवाजे से पूरे शहर के लोग आना-जाना
करते थे। जाते थे, फिर वापस आ जाते थे, लेकिन रविंद्रजी उस दरवाजे से नहीं गए। वो एक ऐसे दरवाजे में दाखिल हो गए जो अंदर से, उस तरफ से बंद हो जाता है। वे अब पूरे शहर के लोगों की तरह आना-जाना नहीं कर सकते। कोई उन्हें आते-जाते नहीं देख सकता। पता नहीं कौनसी अज्ञात, अनंत यात्रा, कौनसा ठोर है, गोल घूमकर वापस आते हैं या सीधे निकल जाते हैं। वे एक दिन अचंभित कर के चले गए. जैसे हर बार, कई बार मैं उनकी जानकारियों और चिंतन से अचंभित होता रहा। उन्होंने ही बताया था, " बाबूल मोरा नैहरवा छूटा ही जाए "  लखनऊ के दसवें और आखिरी नवाब वाजिद अली शाह ने लिखा था। यह भी उनसे ही सुना था कि किस तरह म्यूजिक, डांस और आर्किटेक्चर के लिए वो आखिरी बादशाह हमेशा अपना सर धुनता रहा. उन्होंने बताया कि किस तरह वाजिद अली ने एक परीखाना बनाया, जहां सैकड़ों खूबसूरत लड़कियां डांस और म्यूजिक सीखती थीं. बहुत खूबसूरती और ग्रेसफुली रविंद्रजी बताते थे कि इन लड़कियों को फेयरी यानि परी कहा जाता था। उन्होंने ही बताया था कि लखनऊ से अपने निर्वासन काल के दौरान इस बादशाह ने यह भेरवी ठुमरी बाबूल मोरा नैहरवा लिखी थी। अब तक यह ठुमरी मैने सिर्फ पं. भीमसेन जोशी की आवाज में सुनी थी। बाद में पता चला स्ट्रीट सिंगर फिल्म में कुंदनलाल सहगल ने भी गाई थी, इसके बाद कई और शास्त्रीय मूर्धन्य गायकों ने इसे गाया। वे कई बार शाम को या रात को आॅफिस के बाद अपनी लड़खड़ाती आवाज में राजनीति, धर्म-कर्म, देश, सिस्टम और राजनीति के बड़े लोगों के बारे में अचंभित करने वाले किस्से भी सुनाते थे। किसी शाम संजय गांधी, तो कभी उनके प्रिय चंद्रशेखर ( आज़ाद नहीं ) कुछ किस्सों का जिक्र यहाँ मुफीद नही। वो अपने भीतर शहर भी इकट्ठा करते रहे। उन्होंने अपने अंदर से अपने बलिया, पटना और कलकत्ता को मरने नहीं दिया- इंदौर को वो अपने भीतर लेकर चले। वो अपने पिता के लिए आठ साल की उम्र के बाद बड़े नहीं हुए। जब वो खुद गए तो उनका बेटा भी आठ साल का ही था। मैं फिर अचंभित हूँ, उनके लिए जैसे कोई फिक्स सेड्यूल हो।
नईदुनिया के आॅफिस से बाहर की तरफ पहाड़ों को ताकती उन खिड़कियों के पास तकरीबन हर शाम को रविंद्रजी की जर्जर आवाज में यह ठुमरी एक सिलसिला हो गई थी। हो सकता है इंदौर में वेंटिलेटर पर भी उन्होंने गुनगुनाने की कोशिश की हो। 13 मई 2015 को यह सिलसिला टूट गया। इसी दिन नईदुनिया से मेरी भी रवानगी हो गई। हलक में कुछ अटका सा रह गया। जो अब तक हैं, अटका हुआ। ऐसा लगता है कुछ पूरा होना चाहिए था। पूरा नहीं तो थोडा- बहुत इसके आसपास ही सही। सुबह पाँच बजे नागपुर के एमएलए होस्टल में अकेले रोने का सुख भी आपके कारण भोगा। मुझे ख़ुशी हुई की मैं इस उम्र में भी रो सकता हूँ। उनके आॅफिस में बैठने की कुर्सी और जगह मेरे जहन में है। उन्होंने मुझे खुद को मरा हुआ देखने का मौका भी नहीं दिया। वाजिद अली शाह ने यह ठुमरी लखनऊ से अपने निर्वासन के दौरान लिखी थी और रविंद्रजी इसे अपने निर्वासन के कुछ दिन पूर्व तक गाते- गुनगुनाते रहे। अब, इसके बाद मैं इस ठुमरी को नहीं सुनता हूँ, कभी सुनूंगा तो एक एलजी (शोकगीत) के तौर पर। उनके ठुमरी गाने और उनके चले जाने की टाइमिंग भी मुझे अचंभित कर गई. जैसे गुनगुनाते- गुनगुनाते उन्होंने अपनी तैयारी कर ली हो। हालांकि, एक पुरज़ोर दावे के साथ मैं यह जानता हूँ कि वो मरने के लिए तैयार नहीं थे। एक चिट्ठी में उन्होंने अपने नहीं मरने के लिए प्रार्थना भी की थी, इसलिए नहीं कि वो मौत से डरते थे, इसलिए की उनकी मौत के बाद की जिंदगियां कहाँ और कैसी होगी, वो क्या भोगेगी, लेकिन, शंकरगढ़ के पहाड़ों की तरह उनकी उम्र भी कट गई, घट गई. देह और आत्मा दोनों से स्वस्थ्य आदमी के दिल ने धोखा दे दिया या डॉक्टरों ने यह आज तक समझ नहीं आता। हम हफ्तेभर में दो-तीन बार शराब पीते थे, इस दौरान ऐसा लगता था कि मैं अपने किसी पुरखे के साथ शराब पी रहा हूं। वो मुझे मटन और फिश खिलाने के लिए अपने घर ले जाते थे। मैं उनका आग्रह टालने के लिए उनसे कहता था कि अब मेरी मांस खाने की इच्छा मरती जा रही है। वो कहते थे मांस खाना मत छोड़ना। एक मनुष्य के चरित्र में तामसिक प्रवृतियां होना भी जरुरी है, यह भी वो खुद अपने भीतर सात्विक प्रवृति भी लेकर चलते थे। कभी पूछते थे कि मेरे बच्चों ने कभी पिज्जा नहीं खाया, बताओ कौनसा पिज्जा खिलाऊं, कभी कहते मकान किराये का है यार, लेकिन क्या करना है बस …  बेटा कमाने- खाने के काबिल हो जाए। कभी कहते थे बीमे की राशि मिलती तो है न। साली कंपनियां धोखा तो नहीं दे देगी। लगता था, जैसे वे खुद ही सवाल कर रहे हैं और खुद को ही जवाब दे रहे हैं। आज आपके जन्मदिन पर आपकी मौत के बारे में बात करना ठीक नहीं है, लेकिन यह भी सच है कि मौत और जीवन इन दोनों के बीच के स्पेस के दो किनारे हैं। अब आप उस किनारे पर हैं, और मैं इस किनारे पर। मैं आपके मरने के बाद अब तक आपके जिंदा नहीं होने का कारण और जवाब ढूंढ रहा हूं। मेरे ग्लास से अपना ग्लास टकराकर आवाज ही सुना दो तो यक़ीन आए कि आप सब देख रहे हो, सुन रहे हो और यहीं कहीं हो, इसी किनारे।

बाबुल मोरा, नैहर छूटो ही जाए
बाबुल मोरा, नैहर छूटो ही जाए
चार कहार मिल, मोरी डोलिया सजावें (उठायें)
मोरा अपना बेगाना छूटो जाए
बाबुल मोरा ...
आँगना तो पर्बत भयो और देहरी भयी बिदेश
जाए बाबुल घर आपनो मैं चली पीया के देश
बाबुल मोरा ..

Friday, September 25, 2015

हिबिस्कस


... कुछ रिश्तों और उनके लम्हों को 'सितंबर' के नाम से भी पुकारा जा सकता है। उन रिश्तों का नाम लैम्पपोस्ट रखा जा सकता है। शहर के बीचोंबीच या उसके मुहाने पर रुकी/ ठहरी हुईं झीलें भी किसी दोपहर या शाम के नाम का लम्हा ही है। इन रिश्तों को नदी का किनारा भी बुलाया जा सकता है। काली मिर्च और दाल के छोक की महक से भी तुम याद आती हो। हरी चादर और उस पर बिछे गुलाब के ऊपर बहती इत्र की ख़ुश्बू भी कोई पल हो सकता है। जिस फूल वाली गली से तुम बार- बार गुजरते हो, वो भी तो एक रूमानी सफ़र ही है। ऐसीकहानियों की शुरुआत किसी दोपहर कब्रगाह के पास टहलते हुए भी हो सकती है। वहीँ से कविताएं भी लिखी जा सकती हैं।
... और वो जो कांच के पास दीवार पर अनजाने में अपनी आंख का काजल पोंछ देती हैं, हमारी जिंदगी की इबारतें ही होंगी।
इस शहर की उन कुछ जगहों पर ऊँगली रखकर कहा जा सकता है यह तुम हो, - यहाँ इस जगह तुम ही हो।
- हिबिस्कस हम दोनों का फूल है/
उसके स्कार्फ़ का बेवजह हवा में उड़ना भी तो प्रेम ही है।
- अगस्त डायरी।

Friday, August 21, 2015

... देखो, मैं बारिश में चली आई


मैं आई भी तो बारिश के मौसम में चली आई और देखो बाहर तो बारिश हो भी नहीं रही है, बहरहाल पहले ठुमरी गाऊंगी, फिर कजरी, फिर दादरा और फिर जो भी आप लोग फरमाएंगे वो सुना दूंगी।  सारंगी - तानपुरे की ट्यूनिंग और कैमरों की फ्लेश लाइट के बीच फिर लगा जैसे सूखे पत्तें खरखरा रहे हो, जैसे कोई बहुत पुराना पेड़ गला साफ़ कर गाना शुरू करने वाला है। मुँह में पान - गिलौरी को इधर - उधर सरकाते हुए गिरिजादेवी ने  " जिया मोरा दरपावे " शुरू किया तो ख़याल आया कि किसी घर में कोई दादी गुनगुना रही हो।  गले को बार - बार साफ़ करते हुए सूखी आवाज में  " गगन गरज चमकत दामिनी "  शुरू किया तो महफ़िल की थोड़ी - थोड़ी आंच महसूस होने लगी, लेकिन 80 साल से ज्यादा पुरानी आवाज का खरखराता सूखा बोझ सहन करने का मन नहीं हो रहा था, सोचा घर निकल जाऊं और खाना खाकर सो जाऊं - ईश्वर उनकी उम्र को कई साल और मौसिक़ी को कई सिलसिले अदा करे, लेकिन एक इसी ख़याल से मैं वहां से उठने का हौंसला नहीं जुटा पाया। फिर जब वे गाने के इतर बोलने और समझने लगीं तो ज्यादा ग्रेसफुल नज़र आई।  कहने लगीं - बनारस घराने की गायकी में सबकुछ हैं, टप्पा, ठुमरी ख़्याल,  दादरा, कज़री, चैती, झूला सब - मन था कि बारिश की कोई ठुमरी सुनाऊँ, लेकिन बारिश तो है ही नहीं, इसलिए खमाज की ठुमरी गाती हूँ।  मन के बारे में बात सुनकर अच्छा लगा।  मन की सुनना फायदेमंद भी रहा।  गला साफ़ किया, आलाप और कुछ तानों के बाद रूककर बोलीं - बनारस की ठुमरी है इसलिए इसमें कविताएं या तानें नहीं है, ये सिर्फ सीधी- सीधी ठुमरी हैं।  सीधी - सीधी ठुमरी सी सीधी - साधी और मॉडेस्ट गिरजादेवी अब भाने लगीं।  " संवरिया को देखे बिना नाही चैना " यह ठुमरी खत्म होने तक महफ़िल में सुरों के साथ इत्मिनान पसारने लगा। गले के साथ उनका मन भी साथ देने लगा।  सूखे पत्तों की खरखरी और पुराने पेड़ का बोझ नर्म - मुलायम डाली सा लगने लगा।  इस उम्र में भी उन्हें वक़्त का भान था - वो बोल पड़ी ठुमरी, टप्पा, और दादरा अपनी जगह हैं और कज़री - चैती अपनी जगह हैं, इसलिए थोड़ा - थोड़ा सब सुना दूंगी।  सुरों के साथ हम सब पसरकर बैठने लगे - भीतर देह में एक इत्मिनान सा आ गया।  मेरे घर जल्दी निकलने की कश्मकश छट गई।  गिरिजादेवी को इसलिए दाद नहीं मिल रही थी कि वो इस उम्र में गा रही थी, इसलिए दाद निकल रही थी कि वो गा रही थी और हमारी उम्र में गा रही थी।  शहर के कमिश्नर साब की फ़रमाईश पर  " बरसन लागी बदरिया "  सुना दी।  यह वही ठुमरी थी जो मैंने सबसे पहले बनारस के ही पंडित छन्नुलाल मिश्र की ठेठ गायकी में सुनी थी, लेकिन वही तर्ज़, वही मिज़ाज़ सिर्फ वक़्त और जगह अलग। 17 अगस्त 2015 की तारीख़ में जज़्ब हो चुकी नागपुर की  इस महफ़िल में फिर एक झूला  " धीरे से झुलाओ बनवारी संवरिया, सुर, नर, मुनि सब शोभा देखे " इसके बाद एक दादरा सुना।  जो आवाज थी वो इलाही थी।  मैं सुनकर बे - ख़याल हो गया।  बगल में बैठे बाबू मोशाय के हाथ में रखी पुड़िया से  सींगदानों की ख़ुश्बू से भूख का अहसास हुआ - और मैं अपनी पेट की भूख के लिए घर चला आया।  

तुम्हारी रातें

तुम्हारी रातें 
सबसे सुंदर रातें हों 
उनमे हिज़्र तो कभी न हो 

घिरे उतना ही अँधेरा
नींदों को तलब जितनी

तुम्हारे तकियों का मेरे तकियों से
कोई राब्ता न हों 
उन्हें भीगने की आदत न लगें 

जिस्म में करवटों के सिलसिलें न रहें 
तमाम हकीकतों को हाशिये पर रखकर
तुम्हारे स्वप्न लास्य करें 

चादरों के पास सुनाने के लिए
कोई दास्तां न हो 

ख्वाब भी जी भर के देखे तुम्हे 
कांच के नीले परदें चौकसी करे

आधी रात की दस्तकें करवटों पर बे- असर नज़र आए
तुम बे- वक़्त जागने के हादसें न भुगतो 

तुम्हारी आँखें आसान जिंदगी हो 

तुम्हारे हिस्से में लिखा प्रेम भी 
मेरे भीतर ही पलें
गहराए
गिरें
उठे
फिर टूटे 

हम दोनों
मेरे भीतर ही जिएं
हम दोनों
मेरे भीतर ही मरें 

तुम्हारी रातें
सबसे सुंदर रातें हों
उनमे हिज़्र तो कभी न हों 

तुम्हारें कमरें में नमी और गर्माहट बची रहे
छतों और खिड़कियों से तुम्हारी गहरी दोस्ती हो

तुम्हारे बिस्तरों पर जगह न हों 
बेरहम शायरियों से कोई वास्ता न हो
त्रासदियों से भरे नॉवेल
तुम्हारे सिरहाने न रखें जाए

हम अपने ही मुंह से सुने
तुम्हारा नाम भी
तुम्हे अच्छी लगे अपनी ही खुश्बुएं 

प्यार में न पड़ने की
तुम्हारी कोशिशें कामयाब
और मेरा भ्रम कायम रहे 

तुम्हारी रातें 
सबसे सुंदर रातें हों
उनमे हिज़्र तो कभी न हो. 


Monday, July 20, 2015

... खोटा सिक्का था सुधीर

भगवानदास मूलचंद लुथरिया या भागु या फिर सुधीर। यक़ीनन बहुत कम लोगों को एक ही आदमी के यह तीन नाम याद होंगे। नाम धोखा दे सकते हैं। नाम धोखा देते भी हैं, लेकिन आदमी का अंदाज़ कभी झूठ नहीं बोलता। -अंदाज़ याद रह जाता हैं - और अंदाज़ याद रह गया। मुझे भी और तुम्हे भी। गले की नली से घसीटकर निकली हुई आवाज़ और होंठों के बीच चलती -फिर फिसलती, इस कोने से उस कोने तक खेलती सिगरेट। उस पर बदनीयत से भरी आँखों का टेढ़ापन। खोटा सिक्का था सुधीर, बिलकुल खोटा। खोटा भी अपने खोटेपन में खरा हो सकता हैं, लेकिन पहचाना नहीं गया, फिर भी कुछ लोग हैं जो जानते हैं ऐसे खोटे सिक्कों की कीमत। मैं भी हूँ उनमे से एक। जो खोटे सिक्कों को बाज़ार के साथ नहीं देखता। बस! जेब में रखा हो तो लगता है कि जेब में कुछ हैं। सुधीर की फिल्मों में यही अहमियत थी। ७० एमएम की स्क्रीन वाले बड़े कैनवास पर सब की अपनी पूरी दुनिया होती हैं, जिसे देखने के लिए आँखों को बड़ा करना पड़ता हैं, जोर डालना पड़ता हैं रगों पर। लेकिन सुधीर का नुकीला अंदाज़ खुद नज़र आता हैं - बिना एफर्ट के। कोई कोशिश नहीं बुरा बनने की- सुधीर था ही बुरा। जैसे कोई बुरा आदमी होता हैं, तो बस होता है - और बुरा होने का यही अच्छा गुण हैं। सहज बुरा। खोटा सिक्का सहज खोटा होता हैं - लेकिन मुझे अभी भी याद हैं बचपन के वो सारे खोटे सिक्के जिन्हे मैं अपनी जेब में संभालकर रखता था। तुम भी उन्ही की तरह अब एक स्मृति हो। तुम्हारे अंदाज़ याद रहेंगे भगवानदास मूलचंद लुथरिया या भागु या फिर सुधीर। नाम से तुम्हे कम ही लोग पहचान पाएंगे। इसलिए तुम्हारा एक अंदाज़ यहाँ दिखा रहा हूँ - सुधीर। हो सकता हैं तुम्हारी मौत भी कोई अंदाज़ हो तुम्हारा। १३ मई २०१४

Saturday, July 18, 2015

काजल से खींचों मुझे

चलने की आहटें जहां
वहीँ तुम्हारी आंख के किनारों पर शाम

उंगलियों के पोर में दोपहरें हो

रात गुजरे महक कर
सुबह शीशे की परी हो

रोज सुबह काजल से
खींचों किनारों पर मुझे
रात उतारो आंखों से लेंस की तरह

उस आधे अंधेरे वाली हथेलियों
उड़ते स्कार्फ़ की तरह जिंदगी हो

इन सारे अंधेरे कमरों में
तुम्हारे उजाले गश्त करें

पत्ते टूटे पेड़ से
उम्र टूटकर यूं झरे।

Sunday, July 12, 2015



आनंद आश्रम
... वो जगहें दौड़ती नहीं. 

मेट्रो की रफ्तार से भागती जिंदगी में एक पल भी हाथ से छूट जाए तो इसे वक्त से पीछे हो जाने जैसा माना जाता है. लेकिन कुछ जगहें और कुछ जीवन ऐसे होते हैं जहां थम जाना ही जीवन की गति है. वे लोग भागते नहीं, वो जगहें दौड़ती नहीं. वो जीवन कभी खुद से उबता भी नहीं. धैर्य और संतोष ही जहां जीवन का सार हैं। आनंद आश्रम भोजनालय. नागपुर की धंतोली की एक गली में पुराने आधे लटके एक बोर्ड पर यही लिखा हुआ है. आनंद आश्रम भोजनालय. आजादी के पहले के समय का कुछ-कुछ अंग्रेजों के घरों या कार्यालयों की तरह. टीम-टप्पर सा एक मकान. शीशम की लकड़ियों की टेबल- कुर्सियां और अंदर की तरफ एक कोने में जमीन के अंदर खुदा हुआ एक भट्टीनुमा चूल्हा. इसी चूल्हे की आंच पर पिछले 90 बरसों से लगातार खाना पक रहा है. भट्टी की यह आंच ठंड के दिनों में गर्म आंचल की तरह काम करती है, लेकिन तपतपाती गर्मी में खलती है. फिर भी 47 से भी ज्यादा के आंकड़े में यहां के महाराज भट्टी के सामने घंटों बैठकर रोटियां बेलते हैं. आटा गूथते हैं, और यह सिलसिला सुबह - शाम चलता हैं. सतत कई सालों से चल रहा हैं. दाल-चावल, हरी सब्जी, कड़ी और गेहूं की रोटी. इतने बरसों तक यही इस जगह का मेनू रहा है. लेकिन थाली की कीमत बदल गई है. 90 साल पहले 25 पैसे मतलब चार आना से भी कम में मिलने वाली थाली अब 80 रुपए की है. 

1924 में बना आनंद आश्रम
वासूदेव जोशी, आनंद आश्रम के वर्तमान संचालक बताते हैं कि पार्टनरशिप फर्म के तहत 1924 में आनंद आश्रम की नींव रखी गई थी. इसके चार पार्टनर थे. नंदराम जोशी, चंपालाल जोशी, कोदरजी पुरोहित और केशवजी त्रिवेदी. यह चारों लोग राजस्थान के डूंगरपुर से नागपुर काम की तलाश में आए थे. इसी का नतीजा आनंद आश्रम है. इसी समय यहां यात्रियों के रूकने के लिए एक प्रतीक्षालय और रेस्टोरेंट भी शुरू  किया गया था. श्री जोशी के मुताबिक यहां आने वालों में व्यापारी, थियेटर आर्टिस्ट और राजनीतिज्ञ सभी शामिल हैं. वे यहां घंटों बैठकर देश की राजनीति, आर्ट - कल्चर और संगीत पर बातें करते थे, लेकिन अब यहां ऐसी कोई जाजम नहीं बिछती। वे बुझे मन से बताते हैं- ' अब कौन बात करेगा आर्ट-कल्चर और संगीत की ' . उनका इशारा था की इस अराजकता में किसे फुरसत। 

... जब गांधी जी आते थे 
श्री जोशी ने बताया कि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान गांधीजी कई बार सैनानियों के साथ यहां आते थे. वे आश्रम के पीछे ही स्थित कांग्रेस नेता गंगाधर राव टीकेकर के घर रुकते थे. सभी सैनानी साथियों का भोजन आनंद आश्रम से ही जाता था, लेकिन गांधीजी उस वक्त अन्न ग्रहण नहीं करते थे. वे फल-जल पर ही रहते थे. श्री जोशी आश्रम की दीवार पर लटकी गांधीजी और टीकेकर की तस्वीर दिखाते हैं. इसके बाजू में लगी कष्ण की विराट रूप वाली एक पैंटिंग. जिसके बारे में उनका कहना है कि यह इटली के किसी कलाकार ने बनाकर यहां भेजी है. क्यों बनाई, किसलिए यह तस्वीर भेजी इसकी जानकारी नहीं। उन्होंने संशय के साथ इतना भर कहा की गिफ्ट दी होगी। खेर, पेट की तरफ लौटते हैं। आनंद आश्रम में खाना बनाने के लिए इतने सालों में कभी गैस या अन्य किसी साधन का उपयोग नहीं किया गया. भट्टी पर रखे तवे पर रोटियां फूलती हैं और सब्जी बनती है. कड़ी और सब्जी ठंडी हो जाए तो सिगड़ी पर गर्म हो जाती हैं. शीशम की करीब 70 साल पुरानी गोल टेबल पर बैठकर लोग सादे भोजन का आनंद लेते हैं. श्री जोशी के मुताबिक पहले यहां के भोजन के स्वाद के लिए भीड़ लगती थी, लेकिन अब भी यहां आने वालों की तादात कम नहीं है.

33 साल से महाराज बना रहे खाना
आनंद आश्रम में 7 से 8 लोगों का स्टाफ है. मप्र के रीवा के रामखिलावन तिवारी और सुंदरलाल तिवारी पिछले 33 साल से यहां खाना बना रहे हैं. पहले यहां राजस्थान के कई महाराज खाना बनाया करते थे. अब वे ही 33 साल से यह काम कर रहे हैं. इतनी गर्मी में सुर्ख लाल तपती भट्टी के सामने खाना बनाने के सवाल पर वे कहते हैं कि मजा आता है लोगों को अच्छा खाना खिलाने में. अब उनका रहना- खाना यहीं है और वेतन के रूप में 5 हजार रुपए मिलते है. इतना कम वेतन और परिवार से भी दूर. इस सवाल पर दोनों कुछ नहीं कहते, सिर्फ मुस्कुरा देते हैं. उनकी मुस्कुराहट में जीवन का धैर्य और संतोष छलक आता है. मैं अपनी नाक में भट्टी का धुआं और मन में लिखने के स्वाद के साथ लौट आता हूँ।