Monday, December 21, 2009

मुझे रायना से प्रेम हो गया है


एक दिन रात को निर्मल वर्मा की "वे दिन" पढ़ते हुए...

अभी-अभी एक किताब पढ़कर रखी है और अब कुछ लिखने के बारे में सोच रहा हूँ- एक लगातार सोच और तड़प लिखने के बारे में। लिखने के बारे में सोचना या इस प्रोसेस से गुजरना एक यातना भरा काम है। यह एक अभिशप्त जीवन है जिसे लिखने की या सोचने की यातना भुगतते रहना है- लगातार और हमेशा ... राहत की बात सिर्फ यह है कि यह यातनाएं किश्तों में मिलती है- लिखकर ख़त्म किए जाने और लिखने की अगली शुरुआत के बीच में सुखद अनुभव भी होता है वह जो अंतराल है वह सुखद होता है. फिर अगली यातना भोगने के लिए तैयार भी रहना होता है। लेकिन फिर भी और अल्टीमेटली- लिखना मेरे लिए खुद को खोजने की तरह है- और नहीं लिखना खुद को खो देने की तरह या खुद को खोते जाने की तरह।

पढना फिर भी लिखने की बजाए कुछ-कुछ- और थोडा-बहुत अधिक सुखद भरा है- जब आप रोशनी से भरे अपने कमरे में रात के समय नितांत अकेले निर्मल वर्मा की "वे दिन" पढ़ रहे हो. दिसम्बर की सर्दी हो. जब न सिर्फ प्राग में बल्कि आपके शहर में भी बर्फ गिर रही हो - लेकिन फिर किताब का ख़त्म होना भर है और आपको लौट जाना है यातना से भरे उसी वक़्त में क्योंकि हमारे शहर में प्राग की तरह बर्फ रोज नहीं गिरती।

आधी रात का समय है और सर में बहुत दर्द है- कमरे की झक सफ़ेद रोशनी आखों में अब चुभने लगी है. यह खुद को झोकने की तरह है - मैने कहा था न ... यह एक अभिशप्त जीवन है - लिखना यातना से भरा काम है।

रायना बहुत खुबसूरत है प्राग की सफ़ेद बर्फ की तरह. मुझे रायना से प्रेम हो गया है और प्राग से भी ... वह हमारे शहरों की तरह तो नहीं होगा - अराजक। भले ही हमारे शहरों में बर्फ रोज न गिरती हो उन्हें अराजक तो नहीं होना चाहिए न ... ? और फिर कोई जगह बर्फ न गिरने से बदसूरत तो नहीं हो जाती। मुझे प्राग दिखाई दे रहा है और रायना भी।

सच कहा था तुमने - यह किताब एक नशा है - शेरी, कोन्याक, स्लिबो वित्से - नशा तो होगा ही।

दोनों प्राग की सडकों, पहाड़ों और नाईट क्लब्स में बाहों में बाहें डाले घूमते रहे, चुमते रहे और बातें करते रहे - फिर एक दिन दोनों एक कमरे में घटे - एक मर्मान्तक चाह ... एक अंतहीन खुलापन ...

लेकिन वो किसी की नहीं हो सकती ... नहीं हो सकी ... हो सकता है निर्मल वर्मा आज भी उसे प्राग के खंडहरों में भटकते हुए कहीं खोजते हो...

मुझे रायना से प्रेम हो गया है
और प्राग से भी
वो खुबसूरत है
प्राग की सफ़ेद बर्फ की तरह
किताब में लिखी रायना से कहीं अधिक

वह मेरी आखों में है
शब्दों से बाहर निकल सांस लेती हुई

सच कहा था तुमने
यह किताब एक नशा है
शेरी, कोन्याक, स्लिबो वित्से
और सिगरेट की बेपनाह धुंध
कार्ल मार्क्स स्ट्रीट बहक गई होगी
नशे में चूर होंगे
वहां के नाईट क्लब्स

वहीं किसी बार में
उदास बैठी होगी मारिया
रायना को खोजते होंगे निर्मल वर्मा
प्राग के खंडहरों में

मुझे रायना से प्रेम हो गया है
और प्राग से भी .

Tuesday, December 15, 2009

क्या आपको गुस्सा आयेगा ?

इंदौर में बीरजू नाम के गुंडे ने अरमान नाम के एक बच्चे की कनपटी पर गोली मारकर ह्त्या कर दी। बच्चे की उम्र महज एक साल थी। कहने का अर्थ यह नहीं की एक खूंखार बदमाश ने छोटे बच्चे की ह्त्या कर दी - मुद्दा तो यह है की उस गुंडे ने सेंकडों लोगों के सामने दिन-दहाड़े एक ह्त्या कर दी। ह्त्या करने से पहले उसने यह कहा की आज मेरी किसी का मर्डर करने की इच्छा हो रही है। यह कह कर उसने अपनी पिस्तोल निकाली ओर बच्चे को मौत के घाट उतार दिया।

दुसरे दिन सुबह के तकरीबन सारे अखबारों ने इस घटना को फ्रोंत पेज की हेडिंग बनाया। किसी ने कहा - मासूम को गोली मारी , किसी ने कहा - मासूम की ह्त्या, घर का चिराग बुझा, तो किसी ने कहा- बच्चे की हत्या माँ की गोद सुनी हुई आदि आदि ।

शहर के जिस छेत्र में यह घटना घटी वंहा के लोगो ने तोड़-फोड़ की ओर थाने का घेराव भी किया। इस घटना पर लोगो का त्वरित गुस्सा जायज़ भी था। चलो ... अखबारों की परम्परागत प्रतिक्रियाए भी हजम कर सकते है। असल में हैरत इस बात पर होती है की लोग, मिडिया ओर शहर के बाकी तबकों ने इस घटना को सनसनीखेज तरीके से देखा ओर इसे दिल दहला देने वाली घटना के रूप में ग्रहण किया। जिसका परिणाम भी यही हुआ की भीड़ उग्र हो गई - ओर फिर शांत भी हो गई। वन्ही अख़बार भी भावुक हुए ओर अगले दिन चुपके से चुनाव की खबरों से चिपक गए।

लोगों ओर मिडिया की मनोस्थाती का थोड़ा सा भी जायजा लें तो पता चलता है की लोगों ओर मिडिया का सारा फोकस मासूम बच्चे की ह्त्या पर था ना की ह्त्या पर। जिस तरह से भीड़ ओर मिडिया की प्रतिक्रियाए थी उस लिहाज से मासूम बच्चे की ह्त्या करने वाले को तुरंत फांसी पर लटका दिया जाना चाहिए या उसका एन्कौनतर कर दिया जाना चाहिए - लेकिन इसका दूसरा अर्थ यह भी है की किसी अधिक उम्र याने किसी जवान, अधेड़ या किसी बुजुर्ग की ह्त्या करने वाले हत्यारे को माफ़ कर दिया जाना चाहिए - क्योंकि इस तरह की हत्याए तो रोज होती है जिससे कोई भीड़ उग्र नहीं होती और ना ही कोई अख़बार उसे खबर से ज्यादा कुछ बनता है।

दरअसल हमें ऐसी ही किसी सनसनीखेज घटना का इंतज़ार था क्योंकि शहर में होने वाली अन्य हत्याओं की तो हमें आदत हो गई है। जबकि आज से दस या पंद्रह साल पहले हुई किसी ह्त्या और इस मासूम बच्चे की ह्त्या के सनसनीखेज होने में कोई अंतर नहीं है - अंतर सिर्फ इतना है की हमारी सहनशक्ति बढ़ गई है और संवेदना घटती जा रही है - अपराधी सभी की हत्याए करता चला आ रहा हिया, वो जवानों की, अधेड़ों की, बुजुर्गों की, महिलाओं की, लड़कियों की और बच्चों सभी की हत्या कर रहा है।

जब तक कोई दिल दहला देने वाली घटना नहीं घटेगी हमें गुस्सा नहीं आयेगा, हमें हमारी चोपट होती कानून व्यवस्था पर कभी गुस्सा नहीं आता, अपराधियों को खुले सड़क पर घुमते देख कर गुस्सा नहीं आता, गुंडे जब चुनाव लड़ते है तो भी हमें गुस्सा नहीं आता ओर न ही उन्हें वोट देने में शर्म आती है।

इंदौर को इतरा-इतराकर मुंबई कहने वालों ने शहर में तीन-तीन एसपी तैनात करवा दिए लेकिन इन्होने भी अपने हाथ खड़े कर दिए। एक एसएसपी का कहना है कि इस शहर में किसी को किसी का खौफ नहीं रहा।

मैं जानता हूँ मेरे लिखने से कोई बदलाव नहीं आने वाला क्रांति तो हरगिज़ ही नहीं। मै तो सिर्फ यह याद दिलाना चाहता हु कि किसी चौराहे के मुहाने पर लटके चार बाय छः के फ्लेक्स मे जो तस्वीरे आप दिन-रात आते-जाते देखते है, जिन्हें आप वोट भी देते है उनमे से कोई तस्वीर किसी दिन आपके अरमान कि ह्त्या कर सकती है। क्या आपको गुस्सा आयेगा ?

Monday, November 9, 2009

आधा बिस्मिल्ला प्रभाष...

पाँच नवंबर की देर रात को जनसत्ता के सत्ताईस अगस्त २००६ के कागद कारे कॉलम में उस्ताद बिस्मिल्ला खां के इंतकाल पर प्रभाष जोशी का " गंगा दुआरे नौबत बाजे " पढ़ रहा था. जनसत्ता के इस अंक को अपने एक दोस्त के घर से चुरा कर लाया था. यह पहला मोका था जब मैने जनसत्ता को छुआ था.

आलेख को पढा और सो गया. सुबह उठकर अख़बार देखा तो प्रभाष जी की हेडिंग थी. वह शुक्रवार ब्लैक फ्राईडे की तरह गुजरा- अलसाया हुआ और उदास. बेक ग्राउंड में दिनभर कबीर-कुमार जी का "उढ़ जायेगा हंस अकेला" गूंजता रहा.


प्रभाष जी को धोक देने की इच्छा मन में थी. इसलिए शनिवार सुबह मोती तबेला उनके घर पहुँच गया. वहीं पहूँच कर यकीन हुआ कि नर्मदा उदास और गतिहीन है. यकीन तब और पुख्ता हुआ जब उनके चाहने वालों की सफ़ेद भीड़ में देखा कि उनकी खबर बिक रही है. तकरीबन सात-आठ साल का एक हॉकर वहाँ नईदुनिया बेच रहा था. वही नईदुनिया जँहा से प्रभाष जी ने पत्रकारिता शुरू की थी. यकीन करना ही पड़ा कि नर्मदा का बेटा अपने घर की देहरी पर कॉफीन में लेटा हुआ था जो ताउम्र अखबारों में बहता रहा.

उस रात प्रभाष जी उस आलेख के बहाने याद आए थे जो उन्होंने बिस्मिल्ला की मृत्यु पर लिखा था लेकिन आज भी वेसा ही महसूस हो रहा है जेसा बिस्मिल्ला के न रहने पर हुआ था. जैसे कोई घटना दुबारा घटी हो. गंगा किनारे घाट पर शहनाई बजाता आधा बिस्मिल्ला मालवा में कहीं छुट गया था, जिसे अब नर्मदा किनारे खेड़ीघाट पर जलाया जाएगा.

दोनों के बीच की जुगलबंदी या संगत तो समझ से परे है लेकिन यह तो निश्चित है कि दोनों के अन्दर नदियाँ बहती रहीं. एक गंगा किनारे मंगल धुनें फूंकता रहा और दुसरा सफ़ेद धोती- कुर्ता पहने नर्मदा किनारे टहलता रहा.

प्रभाष जी कुमार गंधर्व के मुख से कबीर के निर्गुणी भजन सुनते हुए अनवरत यात्रा करते रहे और मालवा के साथ-साथ देशभर की संस्कृति और सभ्यता का अलख जगाते रहे. प्रभाष जी को नर्मदा से प्यार था और यह उनके अंदर सतत प्रवाह से बहती रही जिसका वे उम्रभर सबूत देते रहे. अंत में बिस्मिल्ला और प्रभाष जी दोनों ने अपनी-अपनी नदियाँ चुन ली.

प्रभाष जी जैसी जिन्दगी जीना चाहते थे उन्होंने जी, किसी की चाकरी किए बगैर. अपने हाथों से दाल-बाटी बनाकर दोस्तों को दावतें देना, इंदौर की सराफे वाली गलियों में खाना-पीना और कबीरीयत फक्कडपन में घूमना-फिरना उनका मिजाज़ रहा होगा लेकिन उनके अंतर की तहों को शायद ही कोई जान पाया होगा.

बिस्मिल्ला के रागों की तरह प्रभाष जी भी अपने कागद कारे पुरे कर चल दिए. हम भले ही अखबारों को काला करते रहें. इनके अंतर की तहों तक नहीं पहुँच पाएँगे.कभी नहीं पहुँच पाएँगे, उसके लिए तो किसी रात सराफे वाली गली में जाना होगा या नर्मदा के सामने घुटने टेक कर उसमे डुबकी लगाना होगा- प्रभाष जी की डुबकी की तरह- आधा बिस्मिल्ला प्रभाष...

Saturday, October 3, 2009

तारीखें और हॉस्पिटल

तारीखें और हॉस्पिटल
जिंदगी- मौत के बीच
कुछ किलो मीटर

आवाजें- सन्नाटा
साँस... बे- साँस
और इन सब के बीच का अंतर

कहीं कुछ था तो बस
दीवारों पर गोल घूमता हुआ वक्त
वक्त जो चुभता रहा बार-बार
कलाइयों में सुइयां बनकर

सर पर कांच की सफ़ेद बोतलें
झूलती रहीं रात भर
बोतल से टपकती जिंदगी
नली से गुज़रती रही रात भर

कमरे में खिलखिलाते सफ़ेद साए
पलंग पर छटपटाती आवाजें
उलटी, उपके, दर्द, बेचैनी

खिड़कियों से बाहर
विस्तार टटोलती आँखें
उड़ जाना चाहती है शीशे तोड़कर

अंधड़ रास्तों पर
कतारों में चमकती लाईटों से
कहीं अधिक मद्धम है जिंदगी

सड़क किनारे अहाते से आती बू
नशीली नस्ल के ठहाके
और सिगरेट के बेपरवाह धुँए से
शाम अंधिया गई है
मै कमरे में बिखरे
बदबूदार रूई के फोहों को
कानों में ठूस लेना चाहता हूँ

सूखे खून से सनी स्लाइदें
और हॉस्पिटल में बिखरी
असंख्य सुइयों के बीच
एक सपना रेंगता है
एक सिंदूरी पत्थर के सामने
होंठ हनुमान चालीसा बुदबुदाते है

Wednesday, September 2, 2009

अख़बार के किस कॉलम पर है शिवपुत्र


अख़बार के एक कोने से पता चला कि देवास में कुमार गंधर्व समारोह है जिसमे पंडित जी के बेटे मुकुल शिवपुत्र शिरकत करेंगे। इसकी संभावना बहुत कम थी कि शिवपुत्र वहाँ आएंगे और गायेंगे। दिल्ली समेत कई जगहों पर इस तरह के धोके हो चुके है, ऐसा सुना है... सिर्फ़ सुना है इस बात की ताकीद मैं नहीं कर रहा हूँ।

धोके का डर तो था लेकिन उन्हें सुनना भी था और फ़िर जोखिम कोई बहुत बड़ा नहीं था अमीर खां सा'ब के घराने से कुमार गंधर्व घराने तक ही तो जाना था इसलिए निकल पड़े तय वक्त से कुछ पहले। रास्ते भर पता नहीं क्यों मन ही मन यह दोहराता रहा- " मैं इतिहास सुनने जा रहा हूँ।"

देवास पहुँच कर हैरानी हुई यह देखकर कि गंधर्व समारोह में बमुश्किल दो सो लोग ही इकट्ठा हो पाए। किसी छोटी सी से थोड़ी ही बड़ी महफिल- एक- डेड़ घंटे का इंतज़ार ... जैसे-तैसे शाम पिघली तो कौतुहल थोड़ा गहराया - किसी ने किसी के कान में धीरे से सरकाया कि " मुकुल आ गए हैं "। मुझे लगा कि जैसे कोई मन्नत पुरी हो गई - आँखें इधर-उधर तैरने लगी... फ़िर ठहर गई एक दरवाजे के बाहर।

लगभग पचास- चवपन का आदमी - तक़रीबन अध् पकी दाढ़ी- खादी का कुरता और भगवा धोती-कुछ -कुछ साधुओं की तरह। आगे की तरफ़ बाहों में तानपुरा समेटे सीधे मंच पर पहुँचा- नितांत अकेला और निशब्द ... बिना कोई औपचारिक हरकत किए तानपुरा निकाला और उसकी ट्यूनिंग शुरू की - पुरे बीस मिनट छेड़खानी- दो साजिंदे भी उसी तर्ज पर उनके पीछे-पीछे - एक हारमोनियम और दूसरा तबले पर।

उस दिन शाम को पिघलकर रात में तब्दील होते देखा - एक ख़याल और फ़िर एक ठुमरी - बाजूबंद खुल-खुल जाए - रात अंगडाई लेने लगी और एक अंतहीन लम्हा ठुमरी बनकर मंच पर बिखर गया- लोग अपनी - अपनी आत्माओं से समेटते रहे।

एक नज़र भी अपनी बरात को देखे बिना शिवपुत्र जैसे आए थे वैसे ही तपाक से उठकर चल दिए - एक कलाकार जिसे तालियों की दरकार नहीं- उनकी शोर का मोहताज नहीं और ख़ुद के लिए लगे मजमे का अंदाजा भी नहीं। महफ़िल उठ गई।

वापसी में ठुमरी और ख़याल से कान बजते रहे- मेरी आवाज़ भी घुलती रही- आवाजें मिलकर घुलती रहीं - मैं मन ही मन दोहराता रहा-" मैं इतिहास सुनकर आ रहा हूँ "।

एक सुबह मुकुल शिवपुत्र का नाम फ़िर छपा था - इस बार अख़बार के दुसरे कोने मे- ख़बर बनकर ...

कुमार गंधर्व के बेटे मुकुल शिवपुत्र भोपाल मे मंदिरों के सामने भीख मांग रहे है- दो-दो रुपये - बेहोशीं मे रहने के लिए दो रुपये... भोपाल मे... फ़िर होशंगाबाद मे।

मध्यप्रदेश सांस्कृतिक विभाग ने सम्भाला और ख़याल गायकी केन्द्र की नकेल डाली - फ़िर ख़बर है कि बेखबर है मुकुल शिवपुत्र। अख़बार के किस कॉलम पर है शिवपुत्र ।

Sunday, August 30, 2009

दिल्ली


अभी भी मैने सम्भाल कर रखी है
तुम्हारी वो दिल्ली वाली चीज़े

वो दिन की तन्हाई
रात का घोर सन्नाटा
वो शाम का अकेला-पन

अभी भी मैने अपने कमरे में रख रखी है
वो सुबह- सुबह की दिल्ली की सड़क
हजारो ख्वाईशे लिए जिस पर
तुम चली जा रही थी
अपने आप में खोई
मुझसे जुदा
बिल्कुल जुदा

लेकिन मै कहीं ओर था
अपने अंदर तो नही
शायद तुम्हारे अंदर
तुम्हारे भीतर कहीं

वो बस की सीट अभी भी मेरी आँखों में रखी है
जिस पर बैठकर तुम मेरे उपर झुक गई थी
और मुझे गुमाँ हो गया था
तुम्हारा मेरे साथ होने का

वो निगाहें भी मेरे पास ही है
खिड़की से बाहर झांकती
बाज़ार की भीड़ को चीरती
दूर कहीं निकल गई थी
किसी असत्य
कल्पना से परे
जीवन सौंदर्य पर टिक गई होगी

शायद मैं ... ?

चाँदनी चौक की तुम्हारी थकान
अभी भी मेरे बिस्तर पर आराम करती है

वो स्टेशन अभी भी मेरी डायरी में कहीं लिखा हुआ पड़ा है
जहाँ उतरकर तुम
एक मुखौटा बन गई थी
हजारों मुखौटों में खो गई थी .

लेकिन पानी का वो टुकड़ा मेरे पास नही है

जो दिल्ली से वापस आते वक्त
मुझसे दूर जाते वक्त
तुमने मुझे दिया था
अपनी आँखों में रखने के लिए

वो टुकड़ा ट्रेन में कहीं गिर गया है
अब तक किसी मुसाफ़िर ने
अपनी ज़ुबान से छूकर
उठा लिया होगा उसे

एक बार फिर अपनी आँखों से गिराने के लिए .

मैं खुदा का बंदा नही


मैं खुदा का बंदा नही

एक अदद कीड़ा हूँ
इंसानी जिस्म में.

हर शाम पिघल कर
रिस जाता हूँ सड़कों पर.

चिपक जाता हूँ
कई जूतों और चप्पलों में.

कुचल दिया जाता हूँ
तितलियों से प्रेम करने के पाप में
बागों में विचरण के अपराध में.

मैं खुदा का बंदा नहीं

पतंग हूँ अटकी हुई
कई बार उतार ली जाती हूँ
या बाँट ली जाती हूँ
लुटे हुए खजाने की तरह.

मैं रस्सी हूँ
कपड़े सुखाने की
टूटे रिश्तों की तरह
जिसे सिर्फ बँधे रहना हैं
कपड़ों की तरह रखी नही जाती अलमारियों में.

मैं खुदा का बंदा नहीं

पक्षी हूँ
बिजली के तारों पर बैठा
कभी तुम पर
तो कभी तुम पर
ठहर जाता हूँ.

मैं जानता हूँ फर्क
कीड़े, पतंग्, रस्सियों
और तितलियों के बीच का
फर्क प्रेम और घृणा के बीच का.

मगर यूँ ही कभी-कभी
गुस्ताखी कर जाता हूँ
जिंदगीयो तुमसे.

होली



हम हँसते है
दौड़ लगाते है सड़कों पर
अपने चेहरों पर हजारों रंग लगाए .

थक जाते है , हांफ जाते है
लेकिन पीछा करते रहते है
दूसरों के चहरो को रंगने के लिए

कितना खुश है हम
कि जीवन के कितने रंग लगा लिए है
अपने चहरो पर हमने .

हम हंसते रहते है अपना पेट पकड़ कर .

लगातार रंगो से खेलते हुए
हम उत्सव मनाते है
मानो अपने मुखौटे उतारकर
फैक दिए हो हमने कहीं .

कुछ देर ही सही
पर हम अपने अंदर आ जाते है .
हम स्वयं हो जाते है .

लेकिन हमे अखरता है
हमारा अपना होना
डरते है हम अपने ही रंगो से
और घीस - घीस कर साबुन से
बहा देते है नालियो मै
हम अपने ही चेहरो को
और स्वयं को
पहन लेते है
वही भावशुन्य मुखौटा

जिसका अपना कोई रंग नही .

हिटलर ने कहा था


भारत को भारत की चुनौती

26/11 के मुंबई पर फि‍दायीन हमले के बाद मुझे कुछ दोस्‍तों या यूँ कहे कि कुछ जान पहचान के लोग मिले तो मिलते ही उन्‍होंने कहा '' भोत बम फुड़वा र‍िये हो आजकल '' उनके कहने का अर्थ था कि मुंबई में बम विस्‍फोट मैंने करवाए। उन्‍हें य‍ह नहीं पता कि यह बम विस्‍फोट नहीं हमला है। मुंबई पर एक सीधा हमला भारत को चुनौती। इसी तर्ज पर कुछ और लोगो के फोन मेरे पास आए, उनका पहला वाक्‍य भी य‍ही था '' क्‍यों भिया भोत विस्‍फोट करवा रिये हो बम्‍बई में '' ये हमारे देश के आम नागर‍िकों के मुंबई हमले पर व्‍यंग्‍य थे या कहें कि प्रतिक्रियाएँ थीं।

जिन लोगों की बात मैं कर रहा हूँ वे मामुली से अखबारी लोग या पत्रकार है लेकिन आम नागरिकों के तौर पर उन्‍हें देखा जाए तो वे बहुत ताकतवर हैं। जनता बहुत ताकतवर होती है। जनता ही ताकत होती है। जब लाखों-करोड़ों अलग-अलग व्‍यवसाय या क्षेत्र से जुड़े लोगों का विचार बिन्‍दू एक ही हो जाए या सभी का विचार एक ही बिन्‍दू पर केंद्रि‍त हो जाए तो वे पत्रकार, डॉक्‍टर और अध्‍यापक नहीं रह जाते वे जनता हो जाते हैं लेकिन जनता में से जब कुछ लोग देश पर इस तरह के हमले के बाद ऐसी प्रतिक्रियाएँ दें तो सोच लीजि‍ए कि हमें किस 'विचार' की जरूरत है।

भारत को पाकिस्‍तान की चुनौतियाँ

कांधार अपहरण
24 दिसबर 1999 में भारत के इंडियन एयर लाइंस-814 विमान का अपहरण कर लिया गया, जो नेपाल के काठमान्‍डू के त्रि‍भुवन अंतरराष्‍ट्रीय हावई अड्डे से उड़कर दिल्‍ली जाने वाला था, विमान में 180 लोग सवार थे। विमान के सभी 180 यात्रियों को बंधक बनाकर अफगानिस्‍तान ले जाया गया और उन्‍हें छोड़ने के लिए फिरौती और भारत में बंद 180 आतंकवादियों को छुड़वाने की माँग की गई। भारत को अपहरणकर्ताओं की माँगें मानना पड़ी और तीन कट्टर मुस्लिम आतंकवादि‍यों को छोड़ना पड़ा। भारतीय विदेश जसवंत सिंह स्‍वयं कांधार गए और मौलाना मसूद अजहर, मुश्‍ताक अहमद जारगर और अहमद उमर सईद शेख को सौंप कर आए।

संसद पर हमला
13 दिसंबर 2001 में दिल्‍ली में भारत की संसद पर आतंकियों ने हमला किया। हमले के 40 मिनट पहले ही लोकसभा और राज्‍यसभा की कार्यवाही स्‍थगित कर दी गई थी। माना जाता है कि तात्‍कालिन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपयी और विपक्ष की नेता सोनिया गाँधी हमले के कुछ देर पहले ही संसद से निकले थे, जबकि लालकृण आडवाणी और कई नेता हमले के समय संसद में ही थे।

इन दो उल्‍लेखनीय हमलो के अलावा कई बार भारत को पाकिस्‍तान के विरुध्‍द प्रमाण मिले। भारत ने पाकिस्‍तान से जवाब तलब किया। पाकिस्‍तान ने हमेशा ही की तरह अपहरण, बम धमाकों, आतंकी हमलों में अपना हाथ न होने का राग आलापा, पुख्‍ता प्रमाण पेश करने की माँग की और अपना पल्‍ला झाड़कर बच निकला। बावजूद इन सब के भारत की भुमिका उल्‍लेखनीय नहीं रही। बस सेवाएँ, रेल सेवाएँ बंद की गई फ‍िर शांति प्रक्रिया के तहत इन सेवाओं को बहाल किया गया। नए और मजबुत संबंधों की चिल-पुकार में कई निरर्थक प्रयास किए गए और इसी शांति प्रक्रिया के दौरान भारत के दिल्‍ली, मुंबई, बैंगलोर, अहमदाबाद, सुरत, जयपुर, वाराणसी जैसे शहरों पर हमले बदस्‍तूर जारी रहे।

भारत: बहस का एक अदद मंच
भारतीय अखबार और समाचार चैनल्‍स भारत-पाक संबंधों पर बहस, आतंकवाद पर बहस और भष्‍ट्राचार पर बहस से पटे पड़े हैं। बहस का कोई अंत नहीं और नाहीं कोई पर‍िणाम निकलता है, लेकिन पत्रकारों, बुध्‍दीजीवि‍यों और सा‍ह‍ित्‍यकारों ने मि‍लकर इस देश को बहस का एक अदद मंच बनाकर रख दिया है। वर्तमान स्‍थति में भारत एक Debating Society बन गया है। भारत एक (sovereign country) स्‍वतंत्र देश है। इसकी सम्‍प्रभुता पर कई बार हमला हुआ है। यह एक सीधी चुनौती है अगर बहस करने वाला समाज इसे चुनौती माने तो। नहीं तो सीधी सी बात है कि पाकिस्‍तान पर हमला नहीं करे तो कम से कम भारत अपना बचाव तो कर ही सकता है।

सोचना यह है कि भारत अपना बचाव कि‍स रूप में करे। बचाव कर के बचाव करे या हमला कर के बचाव करे। '' ह‍िटलर ने कहा था आक्रमण ही बचाव है ''

Tuesday, August 18, 2009

एब्‍सट्रैक्‍ट कमीने



मुंबई की पटरियों पर सरपट दौड़ती लोकल और बेक ग्राउंड में एक नए किस्म का और कभी कभी जेम्स्बोंड की याद दिलाता म्यूजिक । रेसकोर्स की रेस में भागते घोडों की सी तेज गति की तरह यहाँ से वहाँ लहराते कैमरों ने फ़िल्म को एक अलग ही मंच पर लाकर खड़ा कर दिया है । एक से दुसरे में तब्दील होता सीन इतनी गति लिए होता है की दर्शक बिना पलक झपकाए फ़िल्म देखने को मजबूर हो जाता है। हर सीन इतना कसा हुआ की तमाशबीन पिछला सीन भूल कर आंखों के सामने चलने वाले सीन पर सिमट जाए। चार्ली जब स्क्रीन पर हो तो हम गुड्डू को भूल जाते है और जब गुड्डू दिखाई दे तो चार्ली याद नही आता है, जब स्वीटी दिखती है तो मुंबई की सडकों और लोकल में घुमती वहां की हर उन्मुक्त लड़की बरबस ही याद आ जाती है।

विशाल भारद्वाज कुछ कुछ ही नही बिल्कुल बदले हुए नजर आते है। विशाल ने कमीने में अपने ही पेटर्न को तोडा है। दर्शक फ़िल्म नही मानों ढाई घंटे चलने वाला कोई "मूविंग एब्‍सट्रैक्‍ट आर्ट" देख रहा हो।

मकबूल, ओमकारा और ब्लू अम्ब्रेला देखकर कभी हैरत नहीं होती क्योंकि सभी यह बखूबी जानते है की शेक्सपियर के नाटकों पर विशाल ही इस तरह का बेहतरीन सिनेमा रच सकते है। उनकी फिल्मो में दर्शक आंखों में और चहरे पर उदासी लेकर बाहर निकलता है जिसे हम "सो कॉल्ड ट्रेजेडी" कहते है जिसमे विशाल माहिर भी है।

ओथेलो का देसी चरित्र ओमकारा अपनी पत्नी पर अविश्वास और मानविय स्वार्थपूर्ण षडयंत्र में फंसकर मृत्यु को गले लगा लेता है। मकबूल का मेकबेथ भी अपने लिए मौत ही चुनता है। दर्शक को यह पता नही होता है कि मकबूल और ओमी शुक्ला उनका नायक है या खलनायक है फ़िर भी उनकी मौत का बोझ अपने कंधो पर लेकर सिनेमा हॉल से बाहर निकलता है।

मकडी और ब्लू अम्ब्रेला को छोड़ दें तो विशाल को शेक्सपियर के नाटकों में दखल देने वाला डायरेक्टर ही माना जाता रहा है और वही दखल अंदाजी उनका अपना पेटर्न बन गई इसलिए विशाल के मुरीदों को यही इंतज़ार था कि अब "डेनमार्क का प्रिन्स हेमलेट" देखने को मिलेगा, गोया कि शेक्सपियर जैसे महान नाटककार की रचनाओं में दखल देना गुस्ताखी है लेकिन फ़िर भी मकबूल और ओमकारा सराहनीय है और इन खुबसूरत रचनाओं को माफ़ किया जा सकता है। बहरहाल हैरत होती है जब विशालनुमा शेक्सपियर सिनेमा से बाहर निकल कर कमीने जैसी बेहतरीन एब्‍सट्रैक्‍ट बनाते है।

स्वयं की अवधारणा तोड़ कर नए पेटर्न का सिनेमा दिखाना या बनाना इम्पोस्सिब्ल नहीं तो मुश्किल तो है ही। कमीने विशाल की शैली नहीं है फ़िर भी विशाल ने ही बनाई है इस बात की खुशी होती है। कम से कम विशाल अपने दर्शकों पर भरोसा तो करते ही है इसीलिए कमीने में उन्होंने एक कदम आगे बढ़ा कर सिनेमा के बेहतरीन अनछुए हिस्सों को छुआ है ।

चार्ली सपने बुनता है और रेसकोर्स के घोडे की सी तेज़ गति से भाग कर उन्हें साकार कराने की कोशिश करता है, वह फौर्टकट से भी छोटे फौर्टकट में यकीन करता है जबकि गुड्डू कुत्ती दुनिया के कमीनेपन का शिकार होता रहता है, बहरहाल तमाशे तो बहुत होते है फिल्म कभी कभी बनती है।

Thursday, August 13, 2009

अनंत प्रकाश की ओर

सुबह - सुबह सड़क पर
जब धूल की तरह उड़ती है यादें
तो मन कहता है कि चले आओ .

शाम को जब अपने घर की
खिड़कियों से देखता हूँ
चिड़ियों को चह - चहाते
तो मन कहता है कि चले आओ .

रात को सोने से पहले
सुनता हूँ जब खामोशी के सन्नाटे
तो मन कहता है कि चले आओ .

चले आओ क्योंकि
मै जीवन के उस अंधेरे घर मै खड़ा हूँ
जहाँ से तुम्हारे पास नही आ सकता
ना तुम मुझे देख सकती हो
ना ही मै तुम्हे दिखाई देता हूँ
तुम मुझे सिर्फ मह्सुस कर सकती हो
क्योंकि मै सिर्फ एक अह्सास हूँ
और खड़ा हूँ अभी भी उस अंधेरे घर मै
इस उम्मीद मै कि कहीं से तुम आओगी
और मुझे अपने साथ ले जाओगी
उस अनंत प्रकाश की और
जहाँ सिर्फ तुम मुझे दिखाई देती हो
और सिर्फ मै तुम्हे दिखाई दे सकूँगा.

कभी - कभी देखता हूँ जब
उस अनंत प्रकाश की किरणों को लह - लहाते
तो मन कहता है कि चले आओ

जहाँ कहीं भी हो चले आओ .

Tuesday, August 4, 2009

आदमी


मै रोज इस कुएँ मै झांकता
पानी पर अपनी परछाई देखता
आवाज भी लगाता हूँ
कि कोई सदा लौटकर आएगी
और मुझे अपना पता बताएगी

मगर सड़क पर
दौड़ती , हांफती
इन मशीनो ने
मुझे बहरा बना दिया
और अंधा भी.

बादलों की उंचाईया नापती
इन इमारतों ने मुझे छोटा कर दिया
इतना छोटा
कि बच्चों के लिए
पेड़ से आम नही तोड़ सकता
ना ही अपनी माँ के लिए तोड़ पाता हूँ बिलपत्र.

वो कोई और ही होगा
जिसने अपनी प्रेमिका के लिए तोड़े होंगे तारे.

इंद्रधनुश से रंग चुरा कर
बहन को दिए होंगे
आंगन मै रंगोली बनाने के लिए.

वो कोई और ही होगा
जिसने सुरज मै से
रोशनी की मुट्ठी भर कर
बीवी की मांग भर दी होगी .

आदमी ... ?

नही... नही...
आदमी तो हरगिज नही

मै तो रोज इस कुएँ मै झांकता
पानी पर अपनी परछाई देखता
आवाज भी लगाता हूँ
कि कोई सदा लौटकर आएगी
और मुझे अपना पता बताएगी

Thursday, July 16, 2009

अमंगल में मंगल बिस्मिल्‍लाह...


साँसें ही जीवन होती है और यही साँसें उस्‍ताद बिस्मिल्‍लाह खान साहब अपनी शहनाई में फुँकते थे जो ध्‍वनि बनकर जीवन में तब्दिल हो जाती थी। कहते है कि ध्‍वनियाँ कभी मरती नहीं, विज्ञान ने भी इस बात का समर्थन किया है कि ध्‍वनियाँ हमेशा फिजाओं में गुँजती है। जब ध्‍वनियाँ जिंदा है तो क्‍या इस बात को नहीं माना जा सकता कि बिस्मिल्‍लाह भी अपनी शहनाई की ध्‍वनियों में, सुरों में, बाबा विश्‍वनाथ के मंदिर में, गंगा किनारे बनारस में जिंदा है?

बिस्मिल्‍लाह बिहार के डुमरांव में राजघराने के नौबतखाने में शहनाई बजाने वाले परिवार में जन्‍में थे। शहनाई बजाना उनका खानदानी पेशा रहा है। जब वे बहुत छोटे थे तभी अपने मामा के साथ बनारस आ गए। उनके मामा बाबा विश्‍वनाथ के नौबतखाने में शहनाई बजाते थे इसी जगह पर खान साहब ने शहनाई का रियाज करना शुरू कि‍या। वे यहाँ गंगा में खूब नहाते और फिर बालाजी के सामने घंटों रियाज करते, सच्‍चे सुर की खोज करते।

बिस्मिल्‍लाह ने एक बार कहा था कि यहीं र‍ियाज करते-करते भगवान बालाजी उनके सामने आए और सिर पर हाथ फेर कर कहा कि 'जाओ खूब मजे करो'

फिजाओं में साम्‍प्रदायिकता का जहर घोलते समय यह याद रखना चाह‍िए कि बिस्मिल्‍लाह एक सिया मुसलमान थे जो सुबह बाबा विश्‍वनाथ के मंदिर में शहनाई बजाते, लंगोट पहन कर गंगा में नहाते और बालाजी के सामने रियाज करते। वे पाँच बार के नमाजी थे लेकिन मानते थे कि बालाजी ने ही उन्‍हें शहनाई वरदान में दी है।

क्‍या वह इंसान जो ना ह‍िंदू था और ना मुसलमान विश्‍वनाथ के मंदिर में, गंगा के तट पर बनारस में जिंदा नहीं है? क्‍या ऐसा बिस्‍िमल्‍लाह 15 अगस्‍त 1947 की आजादी की सुबह बनकर लाल किले पर शहनाई नहीं बजा रहा है? क्‍या बिस्मिल्‍लाह जीवन की ध्‍वनि बनकर देश की फिजा में सुर बनकर नहीं बिखरा हूआ है? मृत्यु तो हम सभी की हो गई है कि हमने उनके मकबरे के लिए आज तक चार ईंटे और कुछ स‍ीमेंट तक मुहैया नहीं कराई। कहीं पढ़ा था कि एक बार तो उन्‍हें अपने संयुक्‍त परिवार को चलाने के लिए शहनाई बजाने के लिए जयपूर जाना पड़ा ताकि कुछ पैसे मिल जाए।

ये वही बिस्मिल्‍लाह है जिन्‍हें अमेरिका की एक संस्‍था 'रॉकफेलर फाउंडेशन' अमेरिका में बसाने के लिए हमेशा प्रयास करती रही। संस्‍‍था ने बिस्मिल्‍लाह को उनके कलाकार साथियों के साथ अमेरिका में बसाना चाहा इस वादे के साथ कि वे उन्‍हें अमेरिका में बनारस जेसा उनके मन-माफिक वातावरण उपलब्‍ध कराएँगे। इस पर बिस्मिल्‍लाह ने कहा था कि अमेरिका में बनारस तो बना लोगे पर वहाँ 'मेरी गंगा कहाँ से बहाओगे'

फ‍िजाओं में जहर घूला हुआ है लेकिन ध्‍वनियाँ अभी भी जिंदा है, सुर हवाएँ बनकर अभी भी बह रहें है। शहनाई की मंगल धुनें अभी भी लहरें बनकर गंगा के तट से टकरा रही है। बनारस, काशी, मथुरा, मक्‍का और मदिना में अभी भी मंगल गान गाए जा रहे है, मंगल नृत्य किए जा र‍हे है।

आज के दौर में कोई इस लायक तो नहीं कि किसी का श्राध्‍द करे और फातेहा पढ़े, मैं खुद को तो इस लायक समझता ही नहीं लेकिन फिर भी इस श्राध्‍द में बिस्मिल्‍लाह का फातेहा पढ़ने की कोशिश जरूर करूँगा। कोई खुद को अगर उनका श्राध्‍द करने लायक समझे तो जरूर करे। अमंगल में मंगल बिस्मिल्‍लाह...

Friday, July 3, 2009

बाबा ब्लॉगनाथ की जय हो




क्या बुरे दिन आ गए थे. कितने मंदिर गए। दरगाह पर मत्था टेका। ताबिज बंधवाए कि यह पत्रकार बनने का भूत भाग जाए पर कोई फायदा नही हुआ। घर वालो ने भी अपना सारा जोर लगा दिया। कई नीम - हकीमो को हमे दिखाया पर यह तो होनी थी इसे कौन टाल सकता था भाग मै लिखा कोई टाल सकता है क्या भला. इसी संकट की घड़ी मै आपकी एंट्री हुई बाबा. वाह बाबा आपकी महीमा ही न्यारी है आपने भूखे कलमकारो के मूह मै हाथ डाल दिया है अब मै आपके क्या गुण गाउ आपने तो सभी छोटे - बड़े कलमकारो के के वारे - न्यारे कर दिए . क्या उंचे , क्या नीचे , क्या काम वाले , क्या बेकाम . आपने तो सभी की प्यास बुझा दी , सबकी भूख मिटा दी बाबा . कसम बाबा भोलेनाथ की आप भगवान भोलेनाथ से कम नही . जेसे उन्होने अमृत- मंथन से निकला जहर पीया था वेसे ही आप भी हम सब छोरे - छपाटों के सीने मै उबलता हुआ जहर पीने आ गए हो . क्या दिन थे कसम से . हमे कोई नही पूछता था . ना ही कोई हमारा नाम ही लेता था . लिखने के लिए गली - गली , मोहल्ले - मोहल्ले भटकते थे . छटपटाते थे . कभी यह दैनिक तो कभी वो सांध्य. मगर कोई भी कागद कारा हमारे पेट की भूख और मन की ताप शांत करने नही आया . एक आप ही हमारे खेवनहार बनकर आए हो . अब आप ही हमारे माई - बाप और आप ही हमारे अन्नदाता है . आप ही हमारी कलम की लाज रख सकते है. जितना जो कुछ , थोड़ा बहुत हम जानते है वो लिख सकते है . आपके सामने उगल सकते है . इसे अब आप ही पचा सकते है . हे बाबा ब्लॉगनाथ आपको कसम हे बाबा भोलेनाथ की . आपको हमारा यह जहर भी पीना पड़ेगा और हमे जिंदा रखना पड़ेगा. नही तो हम किधर जायेंगे . अपनी पीर किसे बतायेंगे. क्या करेंगे . कहाँ हम अपना जहर उगलेंगे. सारे अखबारों, पत्रिकाओ पर तो इन तमाम साहित्यकारों और लेखकों ने अधिग्रहण कर लिया है. अब इन्हे कौन समझाए कि यह अधिग्रहन भी सिंगुर और नंदीग्राम जेसा ही है. इन साहित्य्कारो और लेखको मे कुछ तो मर - खप गए है फिर भी अपनी कब्रो मै से निकल - निकल कर हमारी लिख्ने की जो थोड़ी - बहुत स्पेस है वो भी छीन लेते है . और जो जिंदा है वो बार - बार अपना फन उठाकर ऐसा जहर उगलते है कि हम नये- नवेले , अज्ञानी , अभाशी , अधर्मी छोरे - छपाटे डरकर , दुबक कर ऐसा मूह बना लेते है कि हमारे चेहरे पर पत्रकार होने का कोई लक्षण ही नजर ना आए . वेसे भी इन साहित्यकारों के डर से हम अपने पत्रकारिक और लेखकिय गुण उजागर नही कर पाते है उपर से इसके ( पत्रकारिता ) के लक्षण भी इनके खौफ से हमे छुपाना पड़ते है. ऐसे मै हम किधर जाते , कहाँ अपनी कलाकारी दिखाते , कौन हमारी लिखी बांचता. अब आप ही बताओ बाबा ब्लॉगनाथ हुए ना आप हमारे बाबा भोलेनाथ .

Tuesday, June 30, 2009

एक दिन शाम को



तालाब का किनारा

धुँए सी सफ़ेद लहरें

कतारों में हरिकेन सुलग रहे है

रोटी की महक

और मेरे सिगरेट के कश ने

वक्त को जिंदगी में बदल दिया है

में जिंदगी की सबसे हसींन साँस ले रहा हूँ

मानो वक्त को उँगलियों पर लपेट लिया हो मैने

गाँव की लड़कियां अब औरते हो गई है

कुछ अभी भी मेरी आंखों में पिघल रही है

मेरा दोस्त मुर्गा सेक रहा है

और में जिंदगी चख रहा हूँ

Saturday, June 13, 2009

अनिश्चित



मैं अनिश्चित हूँ

तुम भी

वो भी

और हम सब

अनिश्चित ...

Friday, May 22, 2009

बेसुर भीड़




कानों मे पिघलने लगती है ध्वनियाँ


तबला... तानपुरा...




बिलखने लगते है कई घराने


साधते रहे जो सुरों को उम्रभर




मै गुजार देता हूँ सारे पहर इन्टरनेट पर


और डाउनलोड कर लेता हूँ कई राग


भैरवी


आसावरी


खमाज


साँस बस चल रही है


मै ख़याल और ठुमरी जी रहा हूँ




कबीर हो जाता हूँ कभी


कुमार गन्धर्व आ जाते है जब


"उड़ जायेगा हंस अकेला


जग दर्शन का मैला "




ख़याल फूटकर तड़पने लगता है


बनारस की सडकों पर


पं छन्नूलाल मिश्र


"मोरे बलमा अजहूँ न आए "




छलक पड़ती है गजल


रिसने लगती है कानों से


"रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ"




यह अलग बात है की तुम अभी भी


वेंटिलेटर पर सुर साध रहे हो मेहदी हसन।




गन्धर्व का घराना भटकता है सडकों पर


देवास


भोपाल


होशंगाबाद


मुकुल शिवपुत्र


किसी अज्ञात सुर की तलाश मै


इस बेसुरी भीड़ के बीच ...








Monday, May 18, 2009

मेरी प्यारी ओफेलिया


हो या न हो


सवाल बस यही है


क्या सही है घुटते रहना


अपनी ही सोच में


और सह लेना हर उस बात को


जो किस्मत ने तय की है


न कोई आंसू न कोई शिकायत


बस एक चुप्पी...


जो किसी को कुछ जानने न दे


कहीं छूट न जाए पकड़ वक्त से


या फ़िर सही अंत जीवन का


जिसमे मर्जी अपनी हो


सिर्फ़ अपनी...


मगर सवाल तो यह है मेरी प्यारी ओफेलिया


की यह सवाल है क्या...?