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Tuesday, April 25, 2017

आंखें उसकी


उदासी में भींजे हुए फाहे
कोई रख जाए सिरहाने तुम्हारे
तुम देखना आँखें उसकी

जब दीवारों पर ओझल होने लगे
उसके पीठ के निशान कहीं 
तुम देखना आँखें उसकी 

और शाम का आखिरी अंधेरा 
उसकी शक्ल में डूबने लगे जब
तुम देखना आँखें उसकी

गर्मी की इन बोझिल दोपहरों से
जब तुम्हारा साथ छूट जाए
जब कोई किताब भी तुम्हारी टेबल पर न हों
तुम देखना
उसकी उंगलियों के बीच जो जगह है
वो तुम्हारे लिए है

दुनिया जब तुम्हे खींचकर 
कुफ़्र की ओर ले जाए
तुम देखना 
पूरब में उसका घर है

गर्मियों के आखिरी दिनों में
बारिशों से कुछ दिन पहले
जब तुम्हारी आँखों में
ठहर जाए बहुत सारा समंदर
जब बादलों का खाली हाथ लौटना रह जाए
तुम देखना आँखे उसकी

जब पैर रखने के लिए 
कुछ बचा न हो पृथ्वी पर 

तुम याद रखना

तुम्हें लिखने के लिए हमेशा जगह देती रहेगी

तुम बस देखना,
आंखें उसकी।