Saturday, June 12, 2010

शेरी, कोन्याक, स्लिबो वित्से

मुझे रायना से प्रेम हो गया है
और प्राग से भी
वो खुबसूरत है
प्राग की सफ़ेद बर्फ की तरह
किताब में लिखी रायना से कहीं अधिक

वह मेरी आखों में है
शब्दों से बाहर निकल सांस लेती हुई


सच कहा था तुमने
यह किताब एक नशा है

शेरी, कोन्याक, स्लिबो वित्से
और सिगरेट की बेपनाह धुंध
कार्ल मार्क्स स्ट्रीट बहक गई होगी
नशे में चूर होंगे
वहां के नाईट क्लब्स

वहीं किसी बार में
उदास बैठी होगी मारिया
रायना को खोजते होंगे निर्मल वर्मा
प्राग के खंडहरों में

मुझे रायना से प्रेम हो गया है
और प्राग से भी .

Monday, May 24, 2010

वो कोई कैदखाना तो नहीं

मई का महीना है और पारा 44 - 45  पर है. गाँधी का कमरा तकरीबन साढ़े तीनसो से चारसो लोगों से भरा है. उस पर कार्यक्रम के व्यवस्थापकों ने हॉल की करीब पच्चीस- तीस ट्यूबलाईट और चार - पाँच हेलोजन भी जला रखे हैं जिन्हें संगीत की महफ़िल के लिहाज से बुझा देने का ख़याल उनके मन में एक बार भी नहीं आया. कम से कम उर्जा की बचत और एनवॉयरमेंट के बारे में ही सोच लेते. प्रथम पंक्ति में शहर के कुछ रसूखदार लोग भी है स्वाभाविक था गर्मी ओर बढ़ना ही थी. ये तो अच्छा हुआ कि शहर का भू- माफिया बॉबी छाबड़ा चार दिन पहले ही पुलिस के हत्थे चढ़ गया नहीं तो गाँधी के कमरे में आग ही लग जाती. इन सब के बावजूद वहाँ यह देखना अच्छा लग रहा था कि ये रसूख लोग ओर नेता किसी कलाकार को सुनने के लिए फर्श पर आलती -पालती मारकर बैठे थे.
देवास में एक साल पहले पंडित मुकुल शिवपुत्र को सुनकर जो नशा चढ़ा था वो इंदौर में उतरा. लेकिन देवास और इंदौर के बीच के समय में शिवपुत्र की गायकी की खुमारी बाकायदा बनी रही. इसी अन्तराल में अपने कुछ अच्छे दोस्तों से पंडित जी की सीडियां मांग-मांग कर सुनी. इंदौर में उन्हें सुनने का यह एक और मौका था. कुछ लोग हिम्मत और साहस दिखाकर शिवपुत्र को नेमावर आश्रम से लाये और कुछ दिनों तक इंदौर में किसी अखाड़े में कैद कर के रखा. बाईस मई को कुमार गंधर्व जयंती समारोह के बहाने गवाया लेकिन देवास वाला जादू नदारद रहा.

इंदौर में उनके सुनने वाले ज्यादा थे जो धीरे- धीरे घटते चले गए वहीं देवास में चालीस -पचास लोग थे जो वहीं जब्त होकर रह गए. यही फर्क था. सच! इस बार नशा नहीं हुआ. पता नहीं क्यों, पर नहीं हुआ. इसका कोई लौजिकल कारण नहीं है. संगीत में मेरी समझ भी इतनी गहरी नहीं है कि मै उनके किसी सुर को या राग को ख़ारिज करूँ. बस... अच्छा नहीं लगा तो नहीं लगा. देवास में उन्हें सुनना किसी जादू कि तरह था लेकिन इंदौर में मन नहीं लगा. मेरा मोह अभी भंग नहीं हुआ है वे अभी भी क्लासिकल गायकी में पहली पंक्ति के कलाकार है. मै उनके व्यक्तित्व और जीवनशैली से अभिभूत हूँ . जब भी कभी मौका मिला तो उन्हें जरुर सुनूंगा. प्रश्न और उसका जवाब यह है कि कोई भी अच्छा कलाकार हमेशा अच्छा नहीं हो सकता या कोई बुरा कलाकार हमेशा बुरा नहीं हो सकता. अच्छा इन्सान हमेशा अच्छा और बुरा इन्सान हमेशा बुरा हो ये भी जरुरी नहीं. वो घटता - बढ़ता रहता है.

शिवपुत्र की महफ़िल के दुसरे दिन कुछ अखबारों ने अतिरेक के साथ उनकी तारीफ़ मै लिखा है. ये लिखने वाले पूर्वग्रह से ग्रसित है या उनकी जूठी तारीफ़ कर रहे हैं या फिर ये उन हिपोक्रेट लोगों मे से हैं जो सरगम का आरोह - अवरोह भी नहीं जानते और महफ़िलों मे बैठे- बैठे रागों, हरकतों और मुरकियों पर दाद देते रहते हैं.

माफ़ कीजिये ... पंडित मुकुल शिवपुत्र से मैं अभिभूत हूँ और जल्दी ही उनसे कुछ सुनने की उम्मीद लेकर और उन पर कुछ लिखने के लिए नेमावर आश्रम जाऊँगा. लेकिन अख़बार वालों से गुजारिश करूँगा कि  ऐसा ना लिखे कि सुर ही ना मिले. शिवपुत्र कलाकार है कोई कैदखाना नहीं कि बाहर ही ना निकला जा सके .

Thursday, May 20, 2010

तुम

सबकी आँखों मै
फुंकते हो उम्मीदें
सपने बाँटते हो .

घटते रहते हो
अजीब सी कहानियों की तरह
मानों हजारों जिंदगीया ले ली हो
वक्त से उधार तुमने
अब लौटाते हो वापस
एक - एक टुकड़ा जिंदगी
अपने अंदर से तोड़कर .

तुम ईश्वर तो नही
ईश्वर जेसे भी नही .

हाँ , मैंने देखा है
तुम्हारे अंदर
किसी और को सांस लेते हुए
तुम्हारी सांसे उसकी सांसो मै घुलते हुए
शंख बजाते , राख उड़ाते .
सबकी आँखों मै
फुकंते हो उम्मीदें
सपने बाँटते हो .

तुम ईश्वर तो नही
ईश्वर जेसे भी नही
लेकिन मुखोटों के मेलों मै

कुछ - कुछ इंसान के जेसे हो .

Thursday, April 15, 2010

फिरकती लड़कियों में

बोरियत से भरी गर्मियों की
उन तमाम बोझिल दोपहरों में
कुछ मिनटों की आराम तलब
झपकी लेने के बजाये
घंटों इंटरनेट पर
तुम्हे खोजता रहा.

गूगल की उस विशालकार
समुद्रीय टेक्नोलॉजी पर भी
तुम मुझे नहीं मिली.

और में कई दोपहरों में
की - बोर्ड पर
तुम्हारी आवाजें तलाशता रहा.

कई आईने बनाये
हजारों चहरें उलटता
और पलटता रहा रात भर.

सब्जियां खरीदती औरतों की
आँखें टटोली.

गलियों में और सड़कों पर
फिरकती लड़कियों की लम्बी, गेहुवां, गुलाबी
और कभी -कभी सांवली
टांगों को नापता रहा.

इमारतों में
रात के वक़्त
परदों के पीछे
गाउन से ढकीं
कमरों में टहलती
औरतों के सायों को ताकता रहा.

संवलाई चाँदनी में
खिड़कियों से बाहर झांकते 
परदों से लहराते
रात के परिंदों से उड़ते
उरोजों के अंदाज देखता रहा.

Wednesday, April 14, 2010

स्पर्श

तुम्हारा स्पर्श था या जिंदगी
सूखे पत्ते पर टिकी
ओस की बूँद की तरह
छू लिया था तुमने मुझे
पागल नदी की तरह उतर गई मेरे अंदर
जेसे कभी जुदा ना होगी .

तुम्हारा स्पर्श था या बिजली
जो धरती का सीना चीरकर
धंस गई पाताल की गहराईयो मै
और यह कह गई
कि अल - सुबह फिर आउंगी
सूरज बन कर
और तुम्हे जगाउंगी
अपनी गर्म सांसो से .

तुम्हारा स्पर्श था या रोशनी
जो खडी रही दिन भर मेरे सिरहाने
मुझे जगाने के लिए .

शाम दलते - दलते
तुम जा तो रही थी
लेकिन कह रही थी
मुझे पह्चान लेना
मै रात को वापस आउंगी
आधा चांद बन कर
तुम्हे छुने के लिए

तुम्हारा स्पर्श था या जिंदगी .

Friday, April 9, 2010

टूटे हुए बिखरे हुए

वो गंध थी कुछ देहो की
और इस गर्मी का पसीना भी.

कुछ नमक, कुछ शहद बनकर
जबान तक रिस आए थे.

हम अपने-अपने जिस्म उतारकर
रुह को सूँघ रहे थे
हम रिश्ते बुन रहे थे.

वो गंध थी कुछ देहो की
इस गर्मी का पसीना भी
अब एक चुप्पी सी है
गहरा पसरा मौन भी.

वो गंध थी कुछ देहो की
इस गर्मी का पसीना भी .

Monday, March 29, 2010

कमलेश्वर

कितनी सच है तुम्हारी मृत्यु
और कितना सच है यह
कि अब तुम नही रहे .

लेकिन कितना झूठ है यह समय
और कितना झूठा हूँ मै
कि तुम्हे श्रद्धांजलि देने के लिए
किताब उठाकर तुम्हारी
माथे से लगाता हूँ अपने .

और मरने के बाद तुम्हारे
पढ़ना चाहता हूँ कहानी तुम्हारी .

कितना अजीब है यह समय

तुम्हारे ना रहने पर
और अधिक पढ़े जाते हो तुम .

बिस्मिल्लाह की शहनाई
संगत करने लग जाती है लहरों के साथ
गंगा के तट पर .

ऋषिकेश मुखर्जी जब विदा होते है
हर आदमी बन जाता है
आनंद और बाबू मुशाय .

कानों को अच्छे लगने लगते है
सुर और धुने नौशाद की .

सारे किरदार जीवंत हो उठते है
अभिव्यक्ति के लिए
दुनिया के रंग-मंच पर
जब किसी रंगकर्मी के जीवन का
परदा गिर जाता है हमेशा के लिए .

क्या जिंदा रहने से
महत्व घट जाता है
या मर जाना होता है महत्वपूर्ण ...?

Friday, March 26, 2010

रंग ओ कूची वाला यात्री

मकबूल फ़िदा हुसैन के कुछ ब्रश और केनवास देश में बचे थे जिन्हें अब क़तर भेज दिया जाना चाहिए और वो सारी पेंटिंग्स भी जो देश के कई बड़े घरानों के ड्राइंग और बैडरूम्स में टंगी है. हुसैन की भारतीय नागरिकता तो उसी वक़्त ख़त्म हो गई थी जब कुछ हिपोक्रिट लोगों ने उन्हें बनिश्मेंट का फरमान सुना दिया था, क़तर की नागरिकता स्वीकार कर तो उन्होंने भारत में अपनी आखिरी पेंटिंग पर आखिरी पैच लगाया है.
जहाँ तक देश में कलाकारों के आखिरी दिनों के ब्यौर का सवाल है तो भारत की स्थिति कई मायनों में पाकिस्तान से कोई ज्यादा अच्छी नहीं रही है. दोनों देशों ने वक़्त-बा-वक़्त अपने-अपने कलाकारों को उनके आखिरी दिनों में बदहाली और बेबसी में जीने पर मजबूर किया है. उस्ताद बिस्मिल्ला खां की शहनाई के सुरों की गहराईयों और ऊँचाइयों से हर हिन्दुस्तानी वाकिफ है और जिंदगी भर की उनकी मुफलिसी और फाकों से भी कोई ना-वाकिफ नहीं है. इक्कीस अगस्त को उनकी चौथी बरसी पर शायद हम बिस्मिल्ला को याद करें.
सीमा पार भी कलाकारों के बे इन्तहा दर्द का कोई अंत नहीं है. पाकिस्तानी सरकार इतनी भी काबिल नहीं कि अपने बेश कीमती ग़ज़ल फनकार उस्ताद मेहदीं हसन के लिए कुछ लाख रूपये खर्च कर उन्हें फेफड़ों की बीमारी से बचा सके.शायद पाकिस्तान ने अपना सारा धन अमेरिका से गोला बारूद खरीदने में लगा दिया है. आगा खां यूनिवर्सिटी अस्पताल से मेहदीं हसन को सिर्फ इसलिए डिसचार्ज करवाना पड़ा था कि अब उनके कुनबे के पास इलाज के पैसे नहीं बचे थे. लता मंगेशकर ने खां साहब की आवाज को खुदा की आवाज बताया था और उनके इलाज के लिए सारा खर्च उठाने के लिए उन्हें खबर भेजी थी. सच है ... एक कलाकार ही दुसरे कलाकार का दर्द जी सकता है, बशर्ते कलाकार सच्चा हो. जिस गज़ल गायक ने दोनों देशों के लाखों करोड़ों लोगों की जिंदगी में ताउम्र सुर फूंकें उसकी सांस आज पाई पाई को मोहताज है. पता नहीं मेहदीं हसन कैसे पाकिस्तान की उस आबो-हवा में सांस ले रहें है.
हुसैन के साथ भी तकरीबन वही सब हुआ जो दुसरे कलाकारों के साथ हुआ. हिन्दू देवी-देवताओं की विवादस्पद पेंटिंग्स बनाने के कारण हुसैन को एक्सजाइल के लिए मजबूर किया गया. देश में नहीं घुसने देने की धमकियाँ दीं, पेंटिंग्स जलाई गई, एक महान कलाकार के पुतलों को सडकों पर फूंका गया .
हुसैन ने तकरीबन सारी जिन्दगी देश में बिताई. अपनी जिंदगी के 90 साल भारत में गुजारकर सेकड़ों केनवास रंगे और भारत के साथ-साथ दुनिया को भी रंगों के मायने सीखाये. सन 2007 से दुबई और लन्दन में खाक छानी. अब क़तर ने उन्हें अपनी नागरिकता देने का एलान किया है जिसके लिए हुसैन ने कोई गुहार नहीं लगाई थी, ना ही हुसैन किसी और देश की शरण के लिए मोहताज है. एक कलाकार को सांस लेने के लिए किसी देश की नागरिकता की जरुरत नहीं. लेकिन फिर भी उन्होंने इसे स्वीकार कर लिया है, अगर जिन्दा रहने की यही शर्त है तो यही सही...
अभी कुछ दिनों पहले ही हुसैन ने अपना भारतीय पासपोर्ट भी वापस कर दिया है हालाँकि पासपोर्ट वापस लौटने से पहले हुसैन को यह भी ख्याल करना चाहिए था कि शाहरूख खान और आमिर खान भी हिंदुस्तान में रह रहें है, उन्हें देश में उतना डर नहीं लगा जितना हुसैन को लगा.
खैर, हुसैन को यह हक़ है की वो अपनी बाकी जिन्दगी कहाँ गुजरे. एक कूची और कुछ रंगों के साथ नंगे पैर दुनिया नापने वाला 95  साल का बूढ़ा किसी देश की नागरिकता का मोहताज नहीं है. ना हिंदुस्तान और ना ही क़तर. वो हमारी या आपकी दो कोडी के लिए रंगों से नहीं खेलता है. फिल्मों के पोस्टर और कलाकारों के केनवास सडकों पर फूंककर खुश होने वाले जिस दिन हुसैन की कूची और उसके रंग का अर्थ समझ जायेंगे उस दिन वे खुद को किसी देश की नागरिकता के लायक नहीं समझेंगे. हुसैन तो हवा है जिसे किसी वतन की जरुरत नहीं. रंग ओ कूची वाले यात्री को वतन की जरुरत नहीं

Friday, March 5, 2010

यंहा ख्वाब भी टांगो पर चलते है

बड़ी लम्‍बी-सी मछली की तरह लेटी हुई पानी में ये नगरी
कि सर पानी में और पाँव जमीं पर हैं
समन्‍दर छोड़ती है, न समन्‍दर में उतरती है
ये नगरी बम्‍बई की...
जुराबें लम्‍बे-लम्‍बे साह‍िलों की, पिंडलियों तक खींच रक्‍खी है
समन्‍दर खेलता रहता है पैरों से लिपट कर
हमेशा छींकता है, शाम होती है तो 'टाईड' में।

यहीं देखा है साहिल पर
समन्‍दर ओक में भर के
'जोशान्‍दे' की तरह हर रोज पी जाता है सूरज को
बड़ा तन्‍दरुस्‍त रहता है
कभी दुबला नहीं होता!
कभी लगता है ये कोई तिलिस्‍मी-सा जजीरा है
जजीरा बम्‍बई का...

किसी गिरगिट की चमड़ी से बना है आसमाँ इसका
जो वादों की तरह रंगत बदलता है
'कसीनो' में रखे रोले (Roulette) की सूरत चलता रहता है!
कभी इस शहर की गर्दिश नहीं रुकती
बसे 'बियेरिंग' लगे हैं
किसी 'एक्‍सेल' पे रक्‍खा है।

तिलिस्‍मी शहर के मंजर अजब है
अकेले रात को निकलो, सिया साटिन की सड़कों पर
तिलिस्‍मी चेहरे ऊपर जगमगाते 'होर्डिंग' पर झूलते हैं
सितारे झाँकते हैं, नीचे सड़कों पर
वहाँ चढ़ने के जीने ढूँढने पड़ते हैं
पातालों में गुम होकर।

यहाँ जीना भी जादू है...
यहाँ पर ख्‍वाब भी टाँगों पे चलते है
उमंगें फूटती हैं, जिस तरह पानी में रक्‍खे मूंग के दाने
चटखते है तो जीभें उगने लगती हैं
यहाँ दिल खर्च हो जाते हैं अक्‍सर...कुछ नहीं बचता
सभी चाटे हुए पत्‍तल हवा में उड़ते रहते हैं
समन्‍दर रात को जब आँख बन्‍द करता है, ये नगरी
पहन कर सारे जेवर आसमाँ पर अक्‍स अपना देखा करती है

कभी सिन्‍दबाद भी आया तो होगा इस जजीरे पर
ये आधी पानी और आधी जमीं पर जिन्‍दा मछली
देखकर हैराँ हुआ होगा!! - गुलज़ार 

Monday, December 21, 2009

मुझे रायना से प्रेम हो गया है


एक दिन रात को निर्मल वर्मा की "वे दिन" पढ़ते हुए...

अभी-अभी एक किताब पढ़कर रखी है और अब कुछ लिखने के बारे में सोच रहा हूँ- एक लगातार सोच और तड़प लिखने के बारे में। लिखने के बारे में सोचना या इस प्रोसेस से गुजरना एक यातना भरा काम है। यह एक अभिशप्त जीवन है जिसे लिखने की या सोचने की यातना भुगतते रहना है- लगातार और हमेशा ... राहत की बात सिर्फ यह है कि यह यातनाएं किश्तों में मिलती है- लिखकर ख़त्म किए जाने और लिखने की अगली शुरुआत के बीच में सुखद अनुभव भी होता है वह जो अंतराल है वह सुखद होता है. फिर अगली यातना भोगने के लिए तैयार भी रहना होता है। लेकिन फिर भी और अल्टीमेटली- लिखना मेरे लिए खुद को खोजने की तरह है- और नहीं लिखना खुद को खो देने की तरह या खुद को खोते जाने की तरह।

पढना फिर भी लिखने की बजाए कुछ-कुछ- और थोडा-बहुत अधिक सुखद भरा है- जब आप रोशनी से भरे अपने कमरे में रात के समय नितांत अकेले निर्मल वर्मा की "वे दिन" पढ़ रहे हो. दिसम्बर की सर्दी हो. जब न सिर्फ प्राग में बल्कि आपके शहर में भी बर्फ गिर रही हो - लेकिन फिर किताब का ख़त्म होना भर है और आपको लौट जाना है यातना से भरे उसी वक़्त में क्योंकि हमारे शहर में प्राग की तरह बर्फ रोज नहीं गिरती।

आधी रात का समय है और सर में बहुत दर्द है- कमरे की झक सफ़ेद रोशनी आखों में अब चुभने लगी है. यह खुद को झोकने की तरह है - मैने कहा था न ... यह एक अभिशप्त जीवन है - लिखना यातना से भरा काम है।

रायना बहुत खुबसूरत है प्राग की सफ़ेद बर्फ की तरह. मुझे रायना से प्रेम हो गया है और प्राग से भी ... वह हमारे शहरों की तरह तो नहीं होगा - अराजक। भले ही हमारे शहरों में बर्फ रोज न गिरती हो उन्हें अराजक तो नहीं होना चाहिए न ... ? और फिर कोई जगह बर्फ न गिरने से बदसूरत तो नहीं हो जाती। मुझे प्राग दिखाई दे रहा है और रायना भी।

सच कहा था तुमने - यह किताब एक नशा है - शेरी, कोन्याक, स्लिबो वित्से - नशा तो होगा ही।

दोनों प्राग की सडकों, पहाड़ों और नाईट क्लब्स में बाहों में बाहें डाले घूमते रहे, चुमते रहे और बातें करते रहे - फिर एक दिन दोनों एक कमरे में घटे - एक मर्मान्तक चाह ... एक अंतहीन खुलापन ...

लेकिन वो किसी की नहीं हो सकती ... नहीं हो सकी ... हो सकता है निर्मल वर्मा आज भी उसे प्राग के खंडहरों में भटकते हुए कहीं खोजते हो...

मुझे रायना से प्रेम हो गया है
और प्राग से भी
वो खुबसूरत है
प्राग की सफ़ेद बर्फ की तरह
किताब में लिखी रायना से कहीं अधिक

वह मेरी आखों में है
शब्दों से बाहर निकल सांस लेती हुई

सच कहा था तुमने
यह किताब एक नशा है
शेरी, कोन्याक, स्लिबो वित्से
और सिगरेट की बेपनाह धुंध
कार्ल मार्क्स स्ट्रीट बहक गई होगी
नशे में चूर होंगे
वहां के नाईट क्लब्स

वहीं किसी बार में
उदास बैठी होगी मारिया
रायना को खोजते होंगे निर्मल वर्मा
प्राग के खंडहरों में

मुझे रायना से प्रेम हो गया है
और प्राग से भी .

Tuesday, December 15, 2009

क्या आपको गुस्सा आयेगा ?

इंदौर में बीरजू नाम के गुंडे ने अरमान नाम के एक बच्चे की कनपटी पर गोली मारकर ह्त्या कर दी। बच्चे की उम्र महज एक साल थी। कहने का अर्थ यह नहीं की एक खूंखार बदमाश ने छोटे बच्चे की ह्त्या कर दी - मुद्दा तो यह है की उस गुंडे ने सेंकडों लोगों के सामने दिन-दहाड़े एक ह्त्या कर दी। ह्त्या करने से पहले उसने यह कहा की आज मेरी किसी का मर्डर करने की इच्छा हो रही है। यह कह कर उसने अपनी पिस्तोल निकाली ओर बच्चे को मौत के घाट उतार दिया।

दुसरे दिन सुबह के तकरीबन सारे अखबारों ने इस घटना को फ्रोंत पेज की हेडिंग बनाया। किसी ने कहा - मासूम को गोली मारी , किसी ने कहा - मासूम की ह्त्या, घर का चिराग बुझा, तो किसी ने कहा- बच्चे की हत्या माँ की गोद सुनी हुई आदि आदि ।

शहर के जिस छेत्र में यह घटना घटी वंहा के लोगो ने तोड़-फोड़ की ओर थाने का घेराव भी किया। इस घटना पर लोगो का त्वरित गुस्सा जायज़ भी था। चलो ... अखबारों की परम्परागत प्रतिक्रियाए भी हजम कर सकते है। असल में हैरत इस बात पर होती है की लोग, मिडिया ओर शहर के बाकी तबकों ने इस घटना को सनसनीखेज तरीके से देखा ओर इसे दिल दहला देने वाली घटना के रूप में ग्रहण किया। जिसका परिणाम भी यही हुआ की भीड़ उग्र हो गई - ओर फिर शांत भी हो गई। वन्ही अख़बार भी भावुक हुए ओर अगले दिन चुपके से चुनाव की खबरों से चिपक गए।

लोगों ओर मिडिया की मनोस्थाती का थोड़ा सा भी जायजा लें तो पता चलता है की लोगों ओर मिडिया का सारा फोकस मासूम बच्चे की ह्त्या पर था ना की ह्त्या पर। जिस तरह से भीड़ ओर मिडिया की प्रतिक्रियाए थी उस लिहाज से मासूम बच्चे की ह्त्या करने वाले को तुरंत फांसी पर लटका दिया जाना चाहिए या उसका एन्कौनतर कर दिया जाना चाहिए - लेकिन इसका दूसरा अर्थ यह भी है की किसी अधिक उम्र याने किसी जवान, अधेड़ या किसी बुजुर्ग की ह्त्या करने वाले हत्यारे को माफ़ कर दिया जाना चाहिए - क्योंकि इस तरह की हत्याए तो रोज होती है जिससे कोई भीड़ उग्र नहीं होती और ना ही कोई अख़बार उसे खबर से ज्यादा कुछ बनता है।

दरअसल हमें ऐसी ही किसी सनसनीखेज घटना का इंतज़ार था क्योंकि शहर में होने वाली अन्य हत्याओं की तो हमें आदत हो गई है। जबकि आज से दस या पंद्रह साल पहले हुई किसी ह्त्या और इस मासूम बच्चे की ह्त्या के सनसनीखेज होने में कोई अंतर नहीं है - अंतर सिर्फ इतना है की हमारी सहनशक्ति बढ़ गई है और संवेदना घटती जा रही है - अपराधी सभी की हत्याए करता चला आ रहा हिया, वो जवानों की, अधेड़ों की, बुजुर्गों की, महिलाओं की, लड़कियों की और बच्चों सभी की हत्या कर रहा है।

जब तक कोई दिल दहला देने वाली घटना नहीं घटेगी हमें गुस्सा नहीं आयेगा, हमें हमारी चोपट होती कानून व्यवस्था पर कभी गुस्सा नहीं आता, अपराधियों को खुले सड़क पर घुमते देख कर गुस्सा नहीं आता, गुंडे जब चुनाव लड़ते है तो भी हमें गुस्सा नहीं आता ओर न ही उन्हें वोट देने में शर्म आती है।

इंदौर को इतरा-इतराकर मुंबई कहने वालों ने शहर में तीन-तीन एसपी तैनात करवा दिए लेकिन इन्होने भी अपने हाथ खड़े कर दिए। एक एसएसपी का कहना है कि इस शहर में किसी को किसी का खौफ नहीं रहा।

मैं जानता हूँ मेरे लिखने से कोई बदलाव नहीं आने वाला क्रांति तो हरगिज़ ही नहीं। मै तो सिर्फ यह याद दिलाना चाहता हु कि किसी चौराहे के मुहाने पर लटके चार बाय छः के फ्लेक्स मे जो तस्वीरे आप दिन-रात आते-जाते देखते है, जिन्हें आप वोट भी देते है उनमे से कोई तस्वीर किसी दिन आपके अरमान कि ह्त्या कर सकती है। क्या आपको गुस्सा आयेगा ?

Monday, November 9, 2009

आधा बिस्मिल्ला प्रभाष...

पाँच नवंबर की देर रात को जनसत्ता के सत्ताईस अगस्त २००६ के कागद कारे कॉलम में उस्ताद बिस्मिल्ला खां के इंतकाल पर प्रभाष जोशी का " गंगा दुआरे नौबत बाजे " पढ़ रहा था. जनसत्ता के इस अंक को अपने एक दोस्त के घर से चुरा कर लाया था. यह पहला मोका था जब मैने जनसत्ता को छुआ था.

आलेख को पढा और सो गया. सुबह उठकर अख़बार देखा तो प्रभाष जी की हेडिंग थी. वह शुक्रवार ब्लैक फ्राईडे की तरह गुजरा- अलसाया हुआ और उदास. बेक ग्राउंड में दिनभर कबीर-कुमार जी का "उढ़ जायेगा हंस अकेला" गूंजता रहा.


प्रभाष जी को धोक देने की इच्छा मन में थी. इसलिए शनिवार सुबह मोती तबेला उनके घर पहुँच गया. वहीं पहूँच कर यकीन हुआ कि नर्मदा उदास और गतिहीन है. यकीन तब और पुख्ता हुआ जब उनके चाहने वालों की सफ़ेद भीड़ में देखा कि उनकी खबर बिक रही है. तकरीबन सात-आठ साल का एक हॉकर वहाँ नईदुनिया बेच रहा था. वही नईदुनिया जँहा से प्रभाष जी ने पत्रकारिता शुरू की थी. यकीन करना ही पड़ा कि नर्मदा का बेटा अपने घर की देहरी पर कॉफीन में लेटा हुआ था जो ताउम्र अखबारों में बहता रहा.

उस रात प्रभाष जी उस आलेख के बहाने याद आए थे जो उन्होंने बिस्मिल्ला की मृत्यु पर लिखा था लेकिन आज भी वेसा ही महसूस हो रहा है जेसा बिस्मिल्ला के न रहने पर हुआ था. जैसे कोई घटना दुबारा घटी हो. गंगा किनारे घाट पर शहनाई बजाता आधा बिस्मिल्ला मालवा में कहीं छुट गया था, जिसे अब नर्मदा किनारे खेड़ीघाट पर जलाया जाएगा.

दोनों के बीच की जुगलबंदी या संगत तो समझ से परे है लेकिन यह तो निश्चित है कि दोनों के अन्दर नदियाँ बहती रहीं. एक गंगा किनारे मंगल धुनें फूंकता रहा और दुसरा सफ़ेद धोती- कुर्ता पहने नर्मदा किनारे टहलता रहा.

प्रभाष जी कुमार गंधर्व के मुख से कबीर के निर्गुणी भजन सुनते हुए अनवरत यात्रा करते रहे और मालवा के साथ-साथ देशभर की संस्कृति और सभ्यता का अलख जगाते रहे. प्रभाष जी को नर्मदा से प्यार था और यह उनके अंदर सतत प्रवाह से बहती रही जिसका वे उम्रभर सबूत देते रहे. अंत में बिस्मिल्ला और प्रभाष जी दोनों ने अपनी-अपनी नदियाँ चुन ली.

प्रभाष जी जैसी जिन्दगी जीना चाहते थे उन्होंने जी, किसी की चाकरी किए बगैर. अपने हाथों से दाल-बाटी बनाकर दोस्तों को दावतें देना, इंदौर की सराफे वाली गलियों में खाना-पीना और कबीरीयत फक्कडपन में घूमना-फिरना उनका मिजाज़ रहा होगा लेकिन उनके अंतर की तहों को शायद ही कोई जान पाया होगा.

बिस्मिल्ला के रागों की तरह प्रभाष जी भी अपने कागद कारे पुरे कर चल दिए. हम भले ही अखबारों को काला करते रहें. इनके अंतर की तहों तक नहीं पहुँच पाएँगे.कभी नहीं पहुँच पाएँगे, उसके लिए तो किसी रात सराफे वाली गली में जाना होगा या नर्मदा के सामने घुटने टेक कर उसमे डुबकी लगाना होगा- प्रभाष जी की डुबकी की तरह- आधा बिस्मिल्ला प्रभाष...

Saturday, October 3, 2009

तारीखें और हॉस्पिटल

तारीखें और हॉस्पिटल
जिंदगी- मौत के बीच
कुछ किलो मीटर

आवाजें- सन्नाटा
साँस... बे- साँस
और इन सब के बीच का अंतर

कहीं कुछ था तो बस
दीवारों पर गोल घूमता हुआ वक्त
वक्त जो चुभता रहा बार-बार
कलाइयों में सुइयां बनकर

सर पर कांच की सफ़ेद बोतलें
झूलती रहीं रात भर
बोतल से टपकती जिंदगी
नली से गुज़रती रही रात भर

कमरे में खिलखिलाते सफ़ेद साए
पलंग पर छटपटाती आवाजें
उलटी, उपके, दर्द, बेचैनी

खिड़कियों से बाहर
विस्तार टटोलती आँखें
उड़ जाना चाहती है शीशे तोड़कर

अंधड़ रास्तों पर
कतारों में चमकती लाईटों से
कहीं अधिक मद्धम है जिंदगी

सड़क किनारे अहाते से आती बू
नशीली नस्ल के ठहाके
और सिगरेट के बेपरवाह धुँए से
शाम अंधिया गई है
मै कमरे में बिखरे
बदबूदार रूई के फोहों को
कानों में ठूस लेना चाहता हूँ

सूखे खून से सनी स्लाइदें
और हॉस्पिटल में बिखरी
असंख्य सुइयों के बीच
एक सपना रेंगता है
एक सिंदूरी पत्थर के सामने
होंठ हनुमान चालीसा बुदबुदाते है

Wednesday, September 2, 2009

अख़बार के किस कॉलम पर है शिवपुत्र


अख़बार के एक कोने से पता चला कि देवास में कुमार गंधर्व समारोह है जिसमे पंडित जी के बेटे मुकुल शिवपुत्र शिरकत करेंगे। इसकी संभावना बहुत कम थी कि शिवपुत्र वहाँ आएंगे और गायेंगे। दिल्ली समेत कई जगहों पर इस तरह के धोके हो चुके है, ऐसा सुना है... सिर्फ़ सुना है इस बात की ताकीद मैं नहीं कर रहा हूँ।

धोके का डर तो था लेकिन उन्हें सुनना भी था और फ़िर जोखिम कोई बहुत बड़ा नहीं था अमीर खां सा'ब के घराने से कुमार गंधर्व घराने तक ही तो जाना था इसलिए निकल पड़े तय वक्त से कुछ पहले। रास्ते भर पता नहीं क्यों मन ही मन यह दोहराता रहा- " मैं इतिहास सुनने जा रहा हूँ।"

देवास पहुँच कर हैरानी हुई यह देखकर कि गंधर्व समारोह में बमुश्किल दो सो लोग ही इकट्ठा हो पाए। किसी छोटी सी से थोड़ी ही बड़ी महफिल- एक- डेड़ घंटे का इंतज़ार ... जैसे-तैसे शाम पिघली तो कौतुहल थोड़ा गहराया - किसी ने किसी के कान में धीरे से सरकाया कि " मुकुल आ गए हैं "। मुझे लगा कि जैसे कोई मन्नत पुरी हो गई - आँखें इधर-उधर तैरने लगी... फ़िर ठहर गई एक दरवाजे के बाहर।

लगभग पचास- चवपन का आदमी - तक़रीबन अध् पकी दाढ़ी- खादी का कुरता और भगवा धोती-कुछ -कुछ साधुओं की तरह। आगे की तरफ़ बाहों में तानपुरा समेटे सीधे मंच पर पहुँचा- नितांत अकेला और निशब्द ... बिना कोई औपचारिक हरकत किए तानपुरा निकाला और उसकी ट्यूनिंग शुरू की - पुरे बीस मिनट छेड़खानी- दो साजिंदे भी उसी तर्ज पर उनके पीछे-पीछे - एक हारमोनियम और दूसरा तबले पर।

उस दिन शाम को पिघलकर रात में तब्दील होते देखा - एक ख़याल और फ़िर एक ठुमरी - बाजूबंद खुल-खुल जाए - रात अंगडाई लेने लगी और एक अंतहीन लम्हा ठुमरी बनकर मंच पर बिखर गया- लोग अपनी - अपनी आत्माओं से समेटते रहे।

एक नज़र भी अपनी बरात को देखे बिना शिवपुत्र जैसे आए थे वैसे ही तपाक से उठकर चल दिए - एक कलाकार जिसे तालियों की दरकार नहीं- उनकी शोर का मोहताज नहीं और ख़ुद के लिए लगे मजमे का अंदाजा भी नहीं। महफ़िल उठ गई।

वापसी में ठुमरी और ख़याल से कान बजते रहे- मेरी आवाज़ भी घुलती रही- आवाजें मिलकर घुलती रहीं - मैं मन ही मन दोहराता रहा-" मैं इतिहास सुनकर आ रहा हूँ "।

एक सुबह मुकुल शिवपुत्र का नाम फ़िर छपा था - इस बार अख़बार के दुसरे कोने मे- ख़बर बनकर ...

कुमार गंधर्व के बेटे मुकुल शिवपुत्र भोपाल मे मंदिरों के सामने भीख मांग रहे है- दो-दो रुपये - बेहोशीं मे रहने के लिए दो रुपये... भोपाल मे... फ़िर होशंगाबाद मे।

मध्यप्रदेश सांस्कृतिक विभाग ने सम्भाला और ख़याल गायकी केन्द्र की नकेल डाली - फ़िर ख़बर है कि बेखबर है मुकुल शिवपुत्र। अख़बार के किस कॉलम पर है शिवपुत्र ।

Sunday, August 30, 2009

दिल्ली


अभी भी मैने सम्भाल कर रखी है
तुम्हारी वो दिल्ली वाली चीज़े

वो दिन की तन्हाई
रात का घोर सन्नाटा
वो शाम का अकेला-पन

अभी भी मैने अपने कमरे में रख रखी है
वो सुबह- सुबह की दिल्ली की सड़क
हजारो ख्वाईशे लिए जिस पर
तुम चली जा रही थी
अपने आप में खोई
मुझसे जुदा
बिल्कुल जुदा

लेकिन मै कहीं ओर था
अपने अंदर तो नही
शायद तुम्हारे अंदर
तुम्हारे भीतर कहीं

वो बस की सीट अभी भी मेरी आँखों में रखी है
जिस पर बैठकर तुम मेरे उपर झुक गई थी
और मुझे गुमाँ हो गया था
तुम्हारा मेरे साथ होने का

वो निगाहें भी मेरे पास ही है
खिड़की से बाहर झांकती
बाज़ार की भीड़ को चीरती
दूर कहीं निकल गई थी
किसी असत्य
कल्पना से परे
जीवन सौंदर्य पर टिक गई होगी

शायद मैं ... ?

चाँदनी चौक की तुम्हारी थकान
अभी भी मेरे बिस्तर पर आराम करती है

वो स्टेशन अभी भी मेरी डायरी में कहीं लिखा हुआ पड़ा है
जहाँ उतरकर तुम
एक मुखौटा बन गई थी
हजारों मुखौटों में खो गई थी .

लेकिन पानी का वो टुकड़ा मेरे पास नही है

जो दिल्ली से वापस आते वक्त
मुझसे दूर जाते वक्त
तुमने मुझे दिया था
अपनी आँखों में रखने के लिए

वो टुकड़ा ट्रेन में कहीं गिर गया है
अब तक किसी मुसाफ़िर ने
अपनी ज़ुबान से छूकर
उठा लिया होगा उसे

एक बार फिर अपनी आँखों से गिराने के लिए .

मैं खुदा का बंदा नही


मैं खुदा का बंदा नही

एक अदद कीड़ा हूँ
इंसानी जिस्म में.

हर शाम पिघल कर
रिस जाता हूँ सड़कों पर.

चिपक जाता हूँ
कई जूतों और चप्पलों में.

कुचल दिया जाता हूँ
तितलियों से प्रेम करने के पाप में
बागों में विचरण के अपराध में.

मैं खुदा का बंदा नहीं

पतंग हूँ अटकी हुई
कई बार उतार ली जाती हूँ
या बाँट ली जाती हूँ
लुटे हुए खजाने की तरह.

मैं रस्सी हूँ
कपड़े सुखाने की
टूटे रिश्तों की तरह
जिसे सिर्फ बँधे रहना हैं
कपड़ों की तरह रखी नही जाती अलमारियों में.

मैं खुदा का बंदा नहीं

पक्षी हूँ
बिजली के तारों पर बैठा
कभी तुम पर
तो कभी तुम पर
ठहर जाता हूँ.

मैं जानता हूँ फर्क
कीड़े, पतंग्, रस्सियों
और तितलियों के बीच का
फर्क प्रेम और घृणा के बीच का.

मगर यूँ ही कभी-कभी
गुस्ताखी कर जाता हूँ
जिंदगीयो तुमसे.

होली



हम हँसते है
दौड़ लगाते है सड़कों पर
अपने चेहरों पर हजारों रंग लगाए .

थक जाते है , हांफ जाते है
लेकिन पीछा करते रहते है
दूसरों के चहरो को रंगने के लिए

कितना खुश है हम
कि जीवन के कितने रंग लगा लिए है
अपने चहरो पर हमने .

हम हंसते रहते है अपना पेट पकड़ कर .

लगातार रंगो से खेलते हुए
हम उत्सव मनाते है
मानो अपने मुखौटे उतारकर
फैक दिए हो हमने कहीं .

कुछ देर ही सही
पर हम अपने अंदर आ जाते है .
हम स्वयं हो जाते है .

लेकिन हमे अखरता है
हमारा अपना होना
डरते है हम अपने ही रंगो से
और घीस - घीस कर साबुन से
बहा देते है नालियो मै
हम अपने ही चेहरो को
और स्वयं को
पहन लेते है
वही भावशुन्य मुखौटा

जिसका अपना कोई रंग नही .

हिटलर ने कहा था


भारत को भारत की चुनौती

26/11 के मुंबई पर फि‍दायीन हमले के बाद मुझे कुछ दोस्‍तों या यूँ कहे कि कुछ जान पहचान के लोग मिले तो मिलते ही उन्‍होंने कहा '' भोत बम फुड़वा र‍िये हो आजकल '' उनके कहने का अर्थ था कि मुंबई में बम विस्‍फोट मैंने करवाए। उन्‍हें य‍ह नहीं पता कि यह बम विस्‍फोट नहीं हमला है। मुंबई पर एक सीधा हमला भारत को चुनौती। इसी तर्ज पर कुछ और लोगो के फोन मेरे पास आए, उनका पहला वाक्‍य भी य‍ही था '' क्‍यों भिया भोत विस्‍फोट करवा रिये हो बम्‍बई में '' ये हमारे देश के आम नागर‍िकों के मुंबई हमले पर व्‍यंग्‍य थे या कहें कि प्रतिक्रियाएँ थीं।

जिन लोगों की बात मैं कर रहा हूँ वे मामुली से अखबारी लोग या पत्रकार है लेकिन आम नागरिकों के तौर पर उन्‍हें देखा जाए तो वे बहुत ताकतवर हैं। जनता बहुत ताकतवर होती है। जनता ही ताकत होती है। जब लाखों-करोड़ों अलग-अलग व्‍यवसाय या क्षेत्र से जुड़े लोगों का विचार बिन्‍दू एक ही हो जाए या सभी का विचार एक ही बिन्‍दू पर केंद्रि‍त हो जाए तो वे पत्रकार, डॉक्‍टर और अध्‍यापक नहीं रह जाते वे जनता हो जाते हैं लेकिन जनता में से जब कुछ लोग देश पर इस तरह के हमले के बाद ऐसी प्रतिक्रियाएँ दें तो सोच लीजि‍ए कि हमें किस 'विचार' की जरूरत है।

भारत को पाकिस्‍तान की चुनौतियाँ

कांधार अपहरण
24 दिसबर 1999 में भारत के इंडियन एयर लाइंस-814 विमान का अपहरण कर लिया गया, जो नेपाल के काठमान्‍डू के त्रि‍भुवन अंतरराष्‍ट्रीय हावई अड्डे से उड़कर दिल्‍ली जाने वाला था, विमान में 180 लोग सवार थे। विमान के सभी 180 यात्रियों को बंधक बनाकर अफगानिस्‍तान ले जाया गया और उन्‍हें छोड़ने के लिए फिरौती और भारत में बंद 180 आतंकवादियों को छुड़वाने की माँग की गई। भारत को अपहरणकर्ताओं की माँगें मानना पड़ी और तीन कट्टर मुस्लिम आतंकवादि‍यों को छोड़ना पड़ा। भारतीय विदेश जसवंत सिंह स्‍वयं कांधार गए और मौलाना मसूद अजहर, मुश्‍ताक अहमद जारगर और अहमद उमर सईद शेख को सौंप कर आए।

संसद पर हमला
13 दिसंबर 2001 में दिल्‍ली में भारत की संसद पर आतंकियों ने हमला किया। हमले के 40 मिनट पहले ही लोकसभा और राज्‍यसभा की कार्यवाही स्‍थगित कर दी गई थी। माना जाता है कि तात्‍कालिन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपयी और विपक्ष की नेता सोनिया गाँधी हमले के कुछ देर पहले ही संसद से निकले थे, जबकि लालकृण आडवाणी और कई नेता हमले के समय संसद में ही थे।

इन दो उल्‍लेखनीय हमलो के अलावा कई बार भारत को पाकिस्‍तान के विरुध्‍द प्रमाण मिले। भारत ने पाकिस्‍तान से जवाब तलब किया। पाकिस्‍तान ने हमेशा ही की तरह अपहरण, बम धमाकों, आतंकी हमलों में अपना हाथ न होने का राग आलापा, पुख्‍ता प्रमाण पेश करने की माँग की और अपना पल्‍ला झाड़कर बच निकला। बावजूद इन सब के भारत की भुमिका उल्‍लेखनीय नहीं रही। बस सेवाएँ, रेल सेवाएँ बंद की गई फ‍िर शांति प्रक्रिया के तहत इन सेवाओं को बहाल किया गया। नए और मजबुत संबंधों की चिल-पुकार में कई निरर्थक प्रयास किए गए और इसी शांति प्रक्रिया के दौरान भारत के दिल्‍ली, मुंबई, बैंगलोर, अहमदाबाद, सुरत, जयपुर, वाराणसी जैसे शहरों पर हमले बदस्‍तूर जारी रहे।

भारत: बहस का एक अदद मंच
भारतीय अखबार और समाचार चैनल्‍स भारत-पाक संबंधों पर बहस, आतंकवाद पर बहस और भष्‍ट्राचार पर बहस से पटे पड़े हैं। बहस का कोई अंत नहीं और नाहीं कोई पर‍िणाम निकलता है, लेकिन पत्रकारों, बुध्‍दीजीवि‍यों और सा‍ह‍ित्‍यकारों ने मि‍लकर इस देश को बहस का एक अदद मंच बनाकर रख दिया है। वर्तमान स्‍थति में भारत एक Debating Society बन गया है। भारत एक (sovereign country) स्‍वतंत्र देश है। इसकी सम्‍प्रभुता पर कई बार हमला हुआ है। यह एक सीधी चुनौती है अगर बहस करने वाला समाज इसे चुनौती माने तो। नहीं तो सीधी सी बात है कि पाकिस्‍तान पर हमला नहीं करे तो कम से कम भारत अपना बचाव तो कर ही सकता है।

सोचना यह है कि भारत अपना बचाव कि‍स रूप में करे। बचाव कर के बचाव करे या हमला कर के बचाव करे। '' ह‍िटलर ने कहा था आक्रमण ही बचाव है ''

Tuesday, August 18, 2009

एब्‍सट्रैक्‍ट कमीने



मुंबई की पटरियों पर सरपट दौड़ती लोकल और बेक ग्राउंड में एक नए किस्म का और कभी कभी जेम्स्बोंड की याद दिलाता म्यूजिक । रेसकोर्स की रेस में भागते घोडों की सी तेज गति की तरह यहाँ से वहाँ लहराते कैमरों ने फ़िल्म को एक अलग ही मंच पर लाकर खड़ा कर दिया है । एक से दुसरे में तब्दील होता सीन इतनी गति लिए होता है की दर्शक बिना पलक झपकाए फ़िल्म देखने को मजबूर हो जाता है। हर सीन इतना कसा हुआ की तमाशबीन पिछला सीन भूल कर आंखों के सामने चलने वाले सीन पर सिमट जाए। चार्ली जब स्क्रीन पर हो तो हम गुड्डू को भूल जाते है और जब गुड्डू दिखाई दे तो चार्ली याद नही आता है, जब स्वीटी दिखती है तो मुंबई की सडकों और लोकल में घुमती वहां की हर उन्मुक्त लड़की बरबस ही याद आ जाती है।

विशाल भारद्वाज कुछ कुछ ही नही बिल्कुल बदले हुए नजर आते है। विशाल ने कमीने में अपने ही पेटर्न को तोडा है। दर्शक फ़िल्म नही मानों ढाई घंटे चलने वाला कोई "मूविंग एब्‍सट्रैक्‍ट आर्ट" देख रहा हो।

मकबूल, ओमकारा और ब्लू अम्ब्रेला देखकर कभी हैरत नहीं होती क्योंकि सभी यह बखूबी जानते है की शेक्सपियर के नाटकों पर विशाल ही इस तरह का बेहतरीन सिनेमा रच सकते है। उनकी फिल्मो में दर्शक आंखों में और चहरे पर उदासी लेकर बाहर निकलता है जिसे हम "सो कॉल्ड ट्रेजेडी" कहते है जिसमे विशाल माहिर भी है।

ओथेलो का देसी चरित्र ओमकारा अपनी पत्नी पर अविश्वास और मानविय स्वार्थपूर्ण षडयंत्र में फंसकर मृत्यु को गले लगा लेता है। मकबूल का मेकबेथ भी अपने लिए मौत ही चुनता है। दर्शक को यह पता नही होता है कि मकबूल और ओमी शुक्ला उनका नायक है या खलनायक है फ़िर भी उनकी मौत का बोझ अपने कंधो पर लेकर सिनेमा हॉल से बाहर निकलता है।

मकडी और ब्लू अम्ब्रेला को छोड़ दें तो विशाल को शेक्सपियर के नाटकों में दखल देने वाला डायरेक्टर ही माना जाता रहा है और वही दखल अंदाजी उनका अपना पेटर्न बन गई इसलिए विशाल के मुरीदों को यही इंतज़ार था कि अब "डेनमार्क का प्रिन्स हेमलेट" देखने को मिलेगा, गोया कि शेक्सपियर जैसे महान नाटककार की रचनाओं में दखल देना गुस्ताखी है लेकिन फ़िर भी मकबूल और ओमकारा सराहनीय है और इन खुबसूरत रचनाओं को माफ़ किया जा सकता है। बहरहाल हैरत होती है जब विशालनुमा शेक्सपियर सिनेमा से बाहर निकल कर कमीने जैसी बेहतरीन एब्‍सट्रैक्‍ट बनाते है।

स्वयं की अवधारणा तोड़ कर नए पेटर्न का सिनेमा दिखाना या बनाना इम्पोस्सिब्ल नहीं तो मुश्किल तो है ही। कमीने विशाल की शैली नहीं है फ़िर भी विशाल ने ही बनाई है इस बात की खुशी होती है। कम से कम विशाल अपने दर्शकों पर भरोसा तो करते ही है इसीलिए कमीने में उन्होंने एक कदम आगे बढ़ा कर सिनेमा के बेहतरीन अनछुए हिस्सों को छुआ है ।

चार्ली सपने बुनता है और रेसकोर्स के घोडे की सी तेज़ गति से भाग कर उन्हें साकार कराने की कोशिश करता है, वह फौर्टकट से भी छोटे फौर्टकट में यकीन करता है जबकि गुड्डू कुत्ती दुनिया के कमीनेपन का शिकार होता रहता है, बहरहाल तमाशे तो बहुत होते है फिल्म कभी कभी बनती है।

Thursday, August 13, 2009

अनंत प्रकाश की ओर

सुबह - सुबह सड़क पर
जब धूल की तरह उड़ती है यादें
तो मन कहता है कि चले आओ .

शाम को जब अपने घर की
खिड़कियों से देखता हूँ
चिड़ियों को चह - चहाते
तो मन कहता है कि चले आओ .

रात को सोने से पहले
सुनता हूँ जब खामोशी के सन्नाटे
तो मन कहता है कि चले आओ .

चले आओ क्योंकि
मै जीवन के उस अंधेरे घर मै खड़ा हूँ
जहाँ से तुम्हारे पास नही आ सकता
ना तुम मुझे देख सकती हो
ना ही मै तुम्हे दिखाई देता हूँ
तुम मुझे सिर्फ मह्सुस कर सकती हो
क्योंकि मै सिर्फ एक अह्सास हूँ
और खड़ा हूँ अभी भी उस अंधेरे घर मै
इस उम्मीद मै कि कहीं से तुम आओगी
और मुझे अपने साथ ले जाओगी
उस अनंत प्रकाश की और
जहाँ सिर्फ तुम मुझे दिखाई देती हो
और सिर्फ मै तुम्हे दिखाई दे सकूँगा.

कभी - कभी देखता हूँ जब
उस अनंत प्रकाश की किरणों को लह - लहाते
तो मन कहता है कि चले आओ

जहाँ कहीं भी हो चले आओ .