Monday, March 29, 2010

कमलेश्वर

कितनी सच है तुम्हारी मृत्यु
और कितना सच है यह
कि अब तुम नही रहे .

लेकिन कितना झूठ है यह समय
और कितना झूठा हूँ मै
कि तुम्हे श्रद्धांजलि देने के लिए
किताब उठाकर तुम्हारी
माथे से लगाता हूँ अपने .

और मरने के बाद तुम्हारे
पढ़ना चाहता हूँ कहानी तुम्हारी .

कितना अजीब है यह समय

तुम्हारे ना रहने पर
और अधिक पढ़े जाते हो तुम .

बिस्मिल्लाह की शहनाई
संगत करने लग जाती है लहरों के साथ
गंगा के तट पर .

ऋषिकेश मुखर्जी जब विदा होते है
हर आदमी बन जाता है
आनंद और बाबू मुशाय .

कानों को अच्छे लगने लगते है
सुर और धुने नौशाद की .

सारे किरदार जीवंत हो उठते है
अभिव्यक्ति के लिए
दुनिया के रंग-मंच पर
जब किसी रंगकर्मी के जीवन का
परदा गिर जाता है हमेशा के लिए .

क्या जिंदा रहने से
महत्व घट जाता है
या मर जाना होता है महत्वपूर्ण ...?

8 comments:

  1. पंकज झा.March 29, 2010 at 2:55 AM

    और क्या....! ठीक ही तो है....बिना मरे स्वर्ग थोड़े मिलता है...समय आ जाने के बाद मरना भी ज़रूरी है.....अंत भाल तो सब भला.

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  2. इतनी भावपूर्ण कविता के लिए कहने को शब्द हि नहीं है

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  3. व्यक्तित्व को पहचानने के सामाजिक अन्तर्द्वन्द को शब्दों में व्यक्त करने का आभार ।

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  4. कवि का सत्य से साक्षात्कार दिलचस्प है।

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  5. गज़ब की प्रस्तुति…………………।शानदार, लाजवाब, बेह्तरीन्।

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