Friday, March 9, 2012

गैलरी

आवाजों की छतें
हथेलियों सी दीवारें
तुम्हारे होने का अंतिम वाक्य है

दोपहरों की तरह
इन खाली कमरों में
चितेरों लौट आए तुम

वहाँ नीला सफ़ेद का है
काले का अपना सच 
लड़ता हुआ खुद से

हरा भी हो किसी का 

घुल जाते -  मिट गए फिर
मिटते जाते हो

सुख - असुख की परतों पर
प्रेम करते हो तुम
चूमते हो सफ़ेद त्वचाओं को

बंधे नहीं खूंटियों से
गैलरी में टहलते रहे 
इस बार सलीबों पर नहीं चढ़े
पैरों पर चले तो आज़ाद हुए तुम.


Wednesday, February 22, 2012

कलंकित लोगों के शिव

देवास से करीब २५ किलो मीटर की दुरी पर नकलन बसा हुआ है. देवास से नकलन के बीच तीन गावों के नाम ऐसे है जो याद रहे. पटलावदा, लोहाना और आगरोद. नकलन जाने के लिए इन तीनों गावों को लांघना पड़ता है. कुछ कच्चे, कुछ पक्के रास्ते, कुछ जर्जर सड़कें तो कुछ पगडंडियाँ. हमने पगडंडी चुनी. हरी भरी खेतों के बीच लहलहाती हुई पगडंडियाँ. रास्ते में सामने से आते हुए कुछ किसान हाथों में लाठियां लिए नज़र आये.  उन्हें देखकर लगा कि वे किसी दबंग जाति के लोग होंगे. लेकिन वास्तव में वे किसान थे. कुछ औरतें हाथ में छोटी छोटी ढोलकें लेकर पैदल जाती हुई. ये नटनिया थी. ग्रामीण इलाकों के घरों की दहलीजों पर खड़ी होकर ढोलक बजाती है अपना पेट भरने के लिए. ये नटनिया शादी ब्याह में भी गाती बजाती और नाचने का काम करती है. खासतोर से राजपूतों के घरों में. इन्हें देखकर लगा कि इस तरफ आज भी नटनिया है और इसी तरह अपना जीवन बिताती है और पेट भरती है. नकलन जाते समय ऐसा लगा कि कहीं बहुत दूर जा रहे है. दूर तक कहीं कोई ठिकाना नज़र नहीं आता. देर बाद जमीन के उतार पर एक बड़ा झुला नज़र आया. मेले में लगने वाला सबसे बड़ा झुला. नकलन के मेले का झुला.
यहाँ नकलन में निष्कल्न्केश्वर महादेव का मंदिर है. यह मंदिर इस गाँव की अकेली बड़ी पहचान है. कहते है कि किसी जमाने में इस गाँव के आसमान से होकर एक मंदिर उड़ता हुआ जा रहा था. जिसे नकलन में तपस्या करने वाले एक महात्मा ने देख लिया और अपनी साधना की शक्तियों से उसे गाँव में उतार लिया. बाद में यह मंदिर निष्कल्न्केश्वर महादेव के नाम से जाना गया.
मंदिर में भगवान शिव की पंचमुखी प्रतिमा है. शुरू में यह एक मामूली सा दिखने वाला मंदिर था. उस समय प्रजा के लिए मंदिर में प्रवेश भी प्रतिबंधित था. लेकिन बाद में किसी नेपाली राजा ने मंदिर का फिर से निर्माण करवाया और आम लोग भी मंदिर में जाने लगे. इस बात का कोई स्पष्ट उल्लेख यहाँ नहीं है कि मंदिर नेपाली राजा ने फिर से बनवाया था लेकिन नेपाली लिपि में लिखे स्तम्भ और इसी शैली की घंटियाँ मंदिर में मौजूद है जो इस तरफ इशारा करते है कि मंदिर के साथ कुछ न कुछ नेपाली कनेक्शन जरुर है. इसके विपरीत मंदिर के आसमान में उड़ने और महात्मा द्वारा उसे अपनी शक्तियों से जमीन पर उतार लेने के किस्से के बारे में ज्यादा कुछ नहीं कहा जा सकता है. लेकिन यह सच है कि हर साल महाशिवरात्री पर यहाँ लोगों की भीड़ टूट पड़ती है. अनादी ... अनंत शिव के दर्शन के लिए और यहाँ स्थित एक कुण्ड के पानी से अपने रोगों को दूर करने के लिए. इस गाँव और यहाँ आने वाले लोगों का यह विश्वास है कि मंदिर के समय से ही बने हुए इस कुण्ड में नहाने से सफ़ेद दाग और कुष्ठ रोग जैसी बीमारियों से छुटकारा मिल जाता है. शायद इसीलिए यहाँ के शिव का नाम निष्कल्न्केश्वर महादेव पड़ गया. देह के सफ़ेद दाग एक तरह से इंसान के जीवन में कलंक की तरह ही होते है. इसी कलंक को मिटाने के लिए लोग यहाँ चले आते है. इसी दौरान मन के मैल को साफ़ करने की इच्छा भी इंसानों के मन में शायद कहीं दबी पड़ी हो.
हर साल यहाँ महाशिवरात्री पर मेला भी लगता है जो अगले पांच दिनों तक चलता है. पारंपरिक मेले की तरह यहाँ भी लोगों के काम से संबंधी जरुरी चीज़ें, औरतों के सजने संवरने और घरेलु सामान मिलता है. इस महाशिवरात्रि को कुछ घंटे नकलन में गुजरे. यहाँ यही देखा और महसूस किया कि लोग यहाँ आते है.  कुण्ड में नहाकर अपने कलंक मिटाते है और फिर निष्कल्न्केश्वर महादेव के दर्शन कर घर लौट जाते है. घर लौटते हुए मेले से अपनी जरूरतों का सामान भी खरीदते जाते है. वापसी में अधिकतर औरतों के हाथों में मिटटी के मटके नज़र आये तो वही आदमियों के हाथों में गाय बेल हांकने के लिए रंग बिरंगी सजी हुई लाठियां - बच्चे कुछ खिलोने और गुब्बारों के साथ लौट आये- हम आस्था और शंका के बीच घर लौट आये. कलंकित लोगों के निष्कलंकित शिव.

Monday, December 5, 2011

मौत आई भी तो बुढ़ापे का इंतज़ार करती रही.

देव आनन्द जिंदगी भर अपने बूढ़े होने के खिलाफ लड़ते रहे. अपनी उमर की हर सीढ़ी पर खुद को रंगदार जवान साबित करने की कोशिश करते रहे. उम्र अपनी चाल से उनकी तरफ बढती रही लेकिन वे इसकी झुर्रियों को चुन चुन कर छाटते रहे और जवानी के लिए जगह बनाते रहे. जिस उम्र में चलना फिरना मुश्किल हो जाये उस उम्र में उन्होंने कई फ़िल्में बनाई. किसी नौजवान डायरेक्टर की तरह काम किया और धुएं की तरह छट गए बिना बूढ़े हुए. शायद देव आन्नद ही ऐसे इंसान होंगे जिनकी रंगत देखकर कई बार मौत वापस लौटी होगी. इस बार खाली हाथ नहीं लौटने के लिए मौत को कोई बहाना चाहिए था शायद इसीलिए एक ही दौरे का सहारा लिया. लेकिन वो आयी भी तो नींद में ही, आखिर में मौत की भी हिम्मत नहीं हुई कि वो उनके जागते हुए आए. जब वो आयी तो वे लन्दन की एक होटल मेफेयर के कमरे में सो रहे थे.
उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा कि हाँ उन्हें अपने जमाने की सुरैया से प्रेम था. उन्होंने सुरैया के सामने अपनी मोहब्बत का इज़हार भी किया. सुरैया भी देव आनन्द से प्रेम करती थी. लेकिन चीज़ें आगे घट नहीं सकीं. देव आनन्द ने इसके बाद यह भी कहा कि अब वे सुरैया को याद नहीं करते. वो अतीत में नहीं वर्तमान में रहने वाले इंसान है. वास्तव में जिंदगी उनके लिए धुएं की तरह थी. कहानियां उनके जीवन में भी घटती रही, जैसे हर किसी आदमी के जीवन में घटती है. लेकिन वे उन्हें छाटते और आगे निकलते गए हर फ़िक्र को धुएं में उड़ाते हुए. उन्होंने कहा भी है कि उन्हें नियति में यकीन नहीं. इसीलिए उम्रभर अथक काम करते रहे. अपनी मौत के पहले उन्होंने यह भी इच्छा जाहिर कि थी की उन्हें मरने के बाद भारत ना ले जाया जाये. वही लन्दन में ही उनका अन्तिम संस्कार हो. इस के पीछे की वजह तो ठीक तरह से वही जानते है. लेकिन अटकलें तो यही लगाईं जा सकती है कि  नौजवानों को वे अपने चहरे की झुर्रियां नहीं दिखाना चाहते होंगे. सच तो यह है कि देव आनन्द ने अपनी जिंदगी को आजादी के साथ जिया. बगैर इसकी गुलामी किए. इसलिए अतीत के जाले कभी उन पर कब्ज़ा नहीं कर सके. सुरैया की रूमानियत भी उन्हें फ़िक्र में नहीं डाल सकी और जीवन पर अपनी पकड़ बनाये रखी. राजू अपने रास्तों से ही जीवन का स्वामी बना. अतीत के जालों को तोड़कर और वर्तमान पर अपना कब्ज़ा बनाए रखकर. मौत आई भी तो बुढ़ापे का इंतज़ार करती रही. 

Friday, December 2, 2011

तस्‍वीरें...

( युवा कवि और लेखक सोनू उपाध्याय द्वारा अपने अजीज दोस्‍त नवीन रांगियाल की कुछ पुरानी तस्‍वीरों को देखकर 19 जुलाई 2011 को सुबह 10 :15 बजे लिखे गए कुछ विचार जिन्‍होंने अचानक कविता का रूप धर लिया.)  सोनू की अन्य कविताओं और आलेखों के लिए यहाँ क्लिक करें http://vimarshupadhyay.blogspot.com/

क्‍या कहूं तुम्‍हें                                                                   
कि तुम जितने पुराने हो रहे हो
उतना ही ताजा बन पडे हो..
रंगों मे रहकर रंगहीन क्‍यों हो तुम

कि तुम्‍हारे होने न होने के बीच
हर बार तुम्‍हे एक नये रंग के साथ देखता हूं  इन तस्‍वीरों में...
कोई गंध भी तो नहीं है तुम्‍हारी
फिर भी महकता हूं तुम्‍हें याद करते ही..

रहस्‍यमयी है तुम्‍हारी मुस्‍कान
कि तुम्‍हारे हंसते ही पृथ्‍वी सुस्‍ता लेती है थोडी देर
और समंदर मछलियों को थाम लेता है कुछ पल
हवा,  आग,  पानी सारे के सारे
मुठ्ठी भर इतिहास में मचल लेते हैं कुछ देर..

जानता हूं, बात केवल तस्‍वीरों की नहीं हो सकती
गल रही है जिंदगी
मोरी में रखे साबुन की तरह
और ठंडी हो रही है एक आग
जिसे पाल रहे थे हम अपने अंदर
सूरज को निगल जाने की होड में..  

लेकिन क्‍या कहूं तुम्‍हें,  जादूगर हो तुम
तोड चुके हो इस मायावी समय के हर तिलस्‍म को
इस दुनिया के गर्भवती होने के पहले से..
फैल रहे हो  नदी, पर्वत  पेड और फूल से लेकर
नवजातों की पहली मुस्‍कान में..

बडा अजीब लगता है तुम्‍हारा होना इस समय में
जब सांझ का घोसले में लौटना संदिग्‍ध हो
और डूब रही हो बैलों के घुंघरूओं की गूंज
हरिया के चेहरे पर चल रही घर्र-घर्र मशीन में.. 

चौपाल की चर्चा में बताया था मैंने
की सगे की मौत पर समुंदर के भीतर थे
और रोटी की तलाश में भटकते हुए
चिडिया के बच्‍चों को सिखा रहे थे संगीत..

वैसे कहना बहुत कुछ है तुम्‍हे
पर शेष है मुठ्ठी में समय, साथ बिताए दिन
और यह कविता..
जो सपनों में आती है बुजुर्गों और बच्‍चों के
ताकी बीते हुए पर मलाल न हो,
हंसकर खिले कोई नया फूल..
और तुम्‍हारी पुरानी तस्‍वीरों को देखकर
लोग दोस्‍तों को नम आंखों से याद कर सके..

Sunday, September 18, 2011

ले एत्रेंजर

मैं चाय की उसी होटल में बैठा सिगरेट पी रहा था जहाँ हम अक्सर मिलते थे. चाय के लिए मैने लडके को आवाज लगा चूका था पर वह अभी तक चाय लेकर आया नहीं था. इसलिए मैंने सिगरेट सुलगा ली और अपने आसपास छोड़े गए चाय के जूठे गिलासों को देखने लगा. कभी कभी मेरा ध्यान रह रहकर अखबार के कागज़ के उन टुकड़ों पर चला जाता जो लोगों ने पोहे खाकर इधर-उधर फेंक दिए थे. अखबार के उन टुकड़ों में खबरों की हेडिंग्स पर नज़रें ठहर रही थी. कुछ ख़बरें पुरानी और कुछ बहुत पुरानी खबरें थी. कागज़ के टुकड़ों में कुछ खबरें कल ही की थी. यह देखते देखते अचानक एक विचार मन में आ गया कि  ख़बरें कितनी भी बड़ी और ताज़ा ही क्यों हो नाश्ते के साथ परोसे जाने पर उनका कोई मूल्य नहीं होता. मैंने सिगरेट का आखिरी कश लिया और इसी दौरान मुझे उसका ख्याल आ गया ... फिर याद आया कि वो बस अभी आने ही वाली है. वो सामने से आती हुई नज़र आई. मुझे लगा यह उसका ख्याल भर ही है बस. लेकिन वो सचमुच सामने से आती हुई मुझ तक पहुँच रही थी. मैं बस उसे अपनी और आते देखता रहा ... बिलकुल विचार सून्य सा. लगा मेरे पास से होकर वो किसी दुसरे रास्ते की तरफ मुड जायेगी. मैं उससे मिलना नहीं चाह रहा था. दरअसल मैं खुद से मिलना नहीं चाह रहा था. यह बहुत मुश्किल था. 
वह मेरे सामने आकर बैठ गई. सफ़ेद सलवार कुरता और बाजू में काला बैग लटकाया हुआ. बाल जैसे हलकी बारिश से थोड़े भीग से गए हो. लेकिन बरिश नहीं हुई थी. शायद नहाकर सीधे चली आ रही थी. जैसे उसने मुझे भांप लिया हो . क्यों मुझे देखकर ख़ुशी नहीं हुई. ऐसी तल्खी से उसने पहले कभी सवाल नहीं किया था. मैंने जवाब नहीं दिया. मैंने आवाज लगाईं ... एक चाय और लाना. लड़का इस बार जल्दी से चाय ले आया. मैंने अक्सर इस बात का अनुभव किया है कि जब कोई लड़की या महिला साथ हो तो होटल वाले नाश्ते या चाय का ऑर्डर लाने में जरा भी देर नहीं करते. लड़का चाय देकर एक दीवार के सहारे खड़ा हो गया और हम दोनों को निहारने लगा. शायद इसी तरह चाय- पोहे की जूठन और कांच के गिलासों की टन-टन से भरे अपने दिन के कुछ हिस्से को रूमानियत के साथ वे जीते है. वह चाय पीते हुए मुझे देख रही थी. इसमें देखने से अधिक घुरना था. कई दिनों बाद मुझ से मिल रही थी. उसे मुझ से कई बातें करना थी. मुझे खुशी होना चाहिए थी. वह मुझे मेरी अपनी बातें करने वाली थी. संगीत और किताबों की बातें. लेकिन मुझे इस बात की कोई ख़ुशी नहीं थी. मेरा दम घुट रहा था.किताबों की बदबू से मेरा जी घबराने लगा था. उसने अपना मुंह खोल दिया. कल रात मैंने शोभा गुर्टू की ठुमरी सुनी... " याद पिया की आये " मेरे कान फूटने लगे. लगा कानो से गरम शीशा रिसने लगा हो. उसे बोलने से मैं रोक नहीं सकता था. कहने लगी... यह ठुमरी ही है न ! तो फिर ख्याल क्या होता है ...? और दादरा..?  मुझे कोफ़्त होने लगी. सर पर पसीने की बूँदें चमक आई. मतली सी आने लगी. लेकिन वो मुझ से बेपरवाह बस बोले जा रही थी. मैंने मुंह नहीं खोला. खोलता तो उलटी आ जाती. मैंने दूसरी सिगरेट सुलगना चाही इसलिए माचिस टटोलने लगा. उसे लगा अब मैं माचिस लेन के लिए उठूँगा या लड़के को आवाज लगाऊंगा. वह फिर बोलने लगी. वह पता नहीं क्या कह रही थी. उसके वाक्यों के बीच बीच में बस ये नाम सुनाई आ रहे थे ... बड़े गुलाम अली... आमिर खान साहब ... मेहदी हसन... मैं घर जाना चाहता था. लेकिन अब तक वो उबल पड़ी. और वापस लौटा रही थी. वो सब कुछ जो मैंने उसे दिया था. मुझे लगा किसी ने मेरा गला दबा दिया हो. उसने मुझे फिर चौंका दिया...! अरे हाँ...! कल रात को मैंने निर्मल वर्मा का नॉवेल पढ़ा ... वे दिन!  कान से रिसता हुआ गरम शीशा अब कानों से होकर कन्धों तक चला आया. सीना धक् से रहा गया. कन्धों पर से रिसते हुए गरम शीशे और उसके गीलेपन को मैंने छूकर देखा तो मेरी उंगलियाँ लाल हो गई. 
वह बोले जा रही थी ... बेपरवाह ... मानो अकेली हो और खुद से बातें कर रही हो. उसका ध्यान मेरी तरफ नहीं था. तपाक से बोली. और हाँ ! आज तो मैंने वो नॉवेल भी पढना शुरू की है. वो क्या नाम है उसका ... हाँ ! अल्बेयर कामू की ले एत्रंजर ...
हवा तेज़ हो गई. अखबार के टुकड़ों पर छपी खबरें इधर-उधर फडफडाने लगी... मेरा सीधा हाथ जोर से ऊपर उठा और तेज़ी से उसके गले की नली को छूता हुआ गुजर गया. खून का गरम फव्वारा मेरे मुंह पर मुझे महसूस हुआ. मैं चाय के गिलास के टूटे हुए टूकडे को हाथ से वहीं छोड़कर बाहर निकल गया.

Saturday, July 23, 2011

किश्तों के सहारे


अपने दोस्त सोनू उपाध्याय के साथ मुंबई में गुजारे कुछ खास दिनों की याद में...

अब लिखना है मुश्किल
उतना जितना प्रेम का मिल जाना   
इस से तो अच्छा है कि टपक जाये एक आंसू छम से
और तुम सुन सको उसका गिरना

अब कहना है मुश्किल कुछ भी
इस से तो अच्छा है
कि मैं खड़ा रहूँ अतीत के बम्बई में
सायन की गली हो
और तुम मुझे लेने आओ
उसी पहली बार की तरह
या फिर साथ चलो पटरियों के किनारों पर
और बताओ मुझे कि  देखो वो मरीन ड्राइव है और ये बेंडस्टैंड

सेकड़ों फास्ट और लोकल के बीच भी
कितने लोकल थे हम दोनों
इतना कि किसी को जानते नहीं थे
सिवाय एक दुसरे के
बस! यही एक जानकारी थी कि
हम दोनों है
कैसे रहे हम इतने लोगों के बीच 
सिर्फ अपना अपना होकर 
तुम कितने तुम्हारे 
और मैं कितना खुद मेरा था

मुश्किल है बहुत अब तुम्हारा नाम लेना
या तुम दोहराओ मुझे  
इस से तो अच्छा है कि
हम खड़े रहें ट्रेन के इंतज़ार में
या गेट पर खड़े होकर सुने हवाओं  को
या उतर जाये यूँही  कभी हाजी अली पर 
या भीग आयें खारे पानी में 
और जब  लौटे कमरे पर 
तो हमारे पैरों की उँगलियों में रेत चिपकी हो
मैं सिगरेट पीता रहूँ
और तुम्हे
अच्छे लगे छल्ले उसके
या चलते रहे चर्चगेट की सड़कों पर  
थककर हार जाने के लिए
चूर हो जाने तक

हम तस्वीरें नही 
मांस और खूं भी नहीं
जादूगर तुम भी नहीं
मैं भी नहीं
पर जादू है कुछ
जिस से सांस आती है
सांस जाती है
तुम बस मेरा मिजाज लौटा देते हो
साल दर साल किश्तों की तरह
और में जिन्दा रहता हूँ
तुम्हारी चुकाई हुई उन किश्तों के सहारे

Saturday, May 14, 2011

कहाँ हो तुम

केन्टीन से होकर गुजरती 
कॉलेज की वो गली 
बेफिक्र, आवारा और अल्हड आवाजें 
हरी घास पर लेटा हुआ पहला प्रेम 

अकेली दोपहरें 
होस्टल की दीवारों से सटकर
अठखेलिया करते शुरूआती चुम्बन 
गर्मी के दिनों की शामें 
बाहर से आयी उदास 
अकेली लड़कियां 
और कुछ मनचले लडकें 

एक छोर पर 
लड़कियों से घिरा अकेला अनुराग 
लट्टू की तरह घुमती अनुभूति 
गुमसुम पापिया कहाँ हो तुम 

सेंकडों सायकिलों के बीच 
चरित्र अभिनेता धीरज 
किसी नए नाटक की फिक्र में 
स्वांग रचता, संवादों को रटता बार बार 
मंच पर बने रहने की चाह

रिच एंड फेमस।
बंद होंठो की चुप्पी
खामोश अफ़साने सी 
मनीष की निधि कहाँ हो तुम.  

बुझी सोनाली, उदास आरती 
ठकुराइन नेहासिंह 
अंजलि बसंती 
तितली की तरह फुदकती स्वाति 
देवि के सौन्दर्य कहाँ हो तुम 

गाँव की मिटटी सा कैलाश 
नया नया माडर्न सतना वाला इन्दोरी गौरव 
नशे में चूर अय्याश मार्टिन 
लड़कों सी हंसोड़ रागिनी
शर्मीली श्वेता कहाँ हो तुम

बाहर से देखता दुनिया को 
बच्चो को बड़ा करता सोनू 
अश्विनी से सपाट चेहरों
अधूरी कहानी सी प्रशस्ति कहाँ हो तुम 

सेंट्रल लाईब्रेरी के सामने वाला छोटा पेड़ 
कच्ची पक्की दोस्ती या प्रेम 
फल बनकर पक गए हो शायद 
या हजारों उँगलियों के निशान 
चिपके हो अभी भी पेड़ पर 
सौरभ सुमना के प्रेम कहाँ हो तुम 

दिल्ली की रूमानियत 
चांदनी चौक की तंग गलियां 
होटलों में पसरता बेपरवाह 
सिगरेट का धुंआ 
डायरियों में दबे गुलमोहर के फूल 
कमरा  न. 305
कहाँ हो तुम

Saturday, December 11, 2010

अश्वथामा ने कहा था


रात की ख़बरें
घर चली आती है
साथ- साथ

उनकी खुमारियां
साथ सोती है बिस्तर पर

हत्या
जिन्दा जलाया
अधमरा तडपता रहा सड़क पर
जिला अस्पताल

मौत

रात के ठहाके जरुरी है
कांच के गिलासों के साथ

सुबह के वक़्त
क्योंकि मुस्कुराना मुश्किल है

हो सकता है
ऐसे मुस्कुराने पर हंसी आ जाये

पर इस सुबह होंठ हिल ही गए

दिनों बाद ब्रुनो भी
इस सुबह सैर पर साथ गया
उसने भी जमकर ख़ुशी मनाई

सुबह ... आह !

नीली - सफ़ेद
छोटी- छोटी स्कर्ट
कुछ पाँव-पाँव
कुछ साइकिलों से
स्कूल जाती लड़कियां

हम खुश थे
संसार सुन्दर था

एक साथ
स्कूल जाते
बहुत सारे बच्चे
एक अपनी पीठ पर
कद से बड़ी
गिटार लटकाए
म्यूजिक क्लास जाता हुआ

कहीं निर्मल वर्मा की नॉवल का
कोई लैंडस्केप तो नहीं !

कोई छद्म या कल्पना कोई
या असत्य

क्या सच संसार है
या दिखता है सिर्फ

कुछ तो होगा
सुबह लिखी गई
इस कविता के तरह

कविता !

कई उदास
नीरस रातों के बाद

फ्लेशबेक में रखी हुई
एक किताब
वह पंक्ति

अश्वथामा ने कहा था
यह संसार एक दिन अवश्य सुन्दर बनेगा

(ब्रुनो मेरा बच्चा है)

Friday, November 12, 2010

अलावा मेरे

अखरता है मेरा अपना होना मुझे
जबकि जानता हूँ
कि मैं सिर्फ मैं हो सकता हूँ
मै हो सकता नही कोई और
ना कोई और हो सकता हूँ मैं.

अखरता है मेरा अपना होना मुझे.

कि मै नही हूँ वो
जो होना चाहिए था मुझे.

लेकिन क्या हो सकता था मैं ?
अलावा मेरे अपने होने के.

हो सकता था कोई बहुत बुरा
या बहुत अच्छा कोई.

हो सकता था सपना
या सच कोई.

किसी कहानी का चरित्र
या कविता कोई.

मै क्यों हो ना सका
बजती हुई तालियाँ
या नैपथ्य से आती आवाज कोई.

हो सकता था संगीत
या विरह का गीत कोई.

किसी नाटक का अंत
या शुरुआत कोई.

मै क्यों हो ना सका चुप्पी
सवांदो के बीच की
या गहरा पसरा मौन कोई.

शब्द हो सकता था
या ध्वनि उनकी.

हो सकता था कारण कुछ होने का
या फिर अर्थ कुछ भी नही होने का.

Friday, October 15, 2010

सफ़ेद

वो सफ़ेद में थी
और मैं सफ़ेद में

उसकी आँखें
बहुत सारा काजल
पानी ...

बस की रफ़्तार

पीछे छुटते हुए
उस वक़्त के
पेड़, हवा

उस वक़्त की
एक नदी

आँखें ... काजल ... पानी
नशा ... क्या ...?
 
मैं जब्त होता गया

हासिल कुछ भी नहीं 
सिवाय सफ़ेद
और वक़्त के


खोया भी कुछ नहीं
सिवाय सफ़ेद
और वक़्त के

Friday, August 20, 2010

सब कुछ निर्मल है

सब कुछ निर्मल है 

कमरे में छाई धुंध 
जो निर्मल वर्मा 
प्राग से समेटकर लाये थे

रायना की अंतहीन रहस्यमयता को 
अपनी कोख में बसाकर
बेहताश नशे में
भटकती रहती है वे दिन

कमरे में 

टेबल पर एक चिथड़ा सुख है

सुख...!

ना घटता है ना बढ़ता है 

दिन और रात 
असामान्य तरीके से समान है

धुंध से उठती धून
हर वक़्त - हमेशा
बिस्तर पर
सिरहाने रखी रहती है
मै जानबूझकर उसे वहाँ से उठाता नहीं 

मै नींद मै भी देख सकूँ 
चलती हुई दुनिया 

पीछे छुटता हुआ आज 

शब्द और स्मृति 
हिस्सा है 
जीवन और मृत्यु का 
जीवन और मृत्यु की तरह 

सब कुछ निर्मल है 

Saturday, July 24, 2010

नगर में जहरीली छी: थू है

टीप टॉप चौराहें, चमकीले मॉल्स और मेट्रो कल्चर्ड मल्टीप्लेक्स. कोई शक नहीं कि इंदौर विकास या ज्योग्राफिकल बदलाव (विकास या बदलाव पता नहीं ) की तरफ बढ़ रहा है, जो भी हो इसे विकास कि सही परिभाषा तो नहीं कह सकते. यह सच है कि तस्वीर बदल रही है. इस तस्वीर को देखकर शहर का हर आम और खास गदगद नज़र आता है. शहर के आसपास की ग्रामीण बसाहट भी इस चमक से खुश होकर इस तरफ खिंची चली आ रही है. ये ग्रामीण तबका शहर का इतना दीवाना है कि गाँव में अपनी खेतीबाड़ी छोड़कर यहाँ मोबाइल रिचार्ज करवाकर मॉल्स और मल्टीप्लेक्स में शहरी मछलियों के बीच गोता लगा रहे हैं. माफ़ कीजिये अब ये गाँव वाले भी भोलेभाले नहीं रहे.

अगर शहर विकास के मुहाने पर खड़ा है तो,  इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि  जगह- जगह खुदी सड़कें, बेतरतीब  व बेहाल यातायात और तकरीबन रोज होती चोरी व हत्याएं प्रशासन की चोरबाजारी, लापरवाही व शहर की बदहाली की कहानी कह रहा है. बात- बात पर शहर को मिनी बॉम्बे कहकर जुगाली करने वाले इन्दोरियों को पता नहीं है कि मुंबई कि भीड़ किस रहस्यमय तरीके से अपने आप में नियंत्रित है. इंदौर के लोग सिविलियन एथिक्स भूलते जा रहें हैं या ये एथिक्स कभी हमने सीखे ही नहीं. वक़त बे वक़त सड़कों पर उतरकर अपने अधिकारों का वास्ता देकर मांगें करने वाले नागरिक सड़क पर चलते समय अपने सारे फ़र्ज़ भूल जाते हैं. आजकल यातायात का हाल देखते ही बनता है, सारे कायदे भूलकर जिसे जहाँ जगह मिलती है घुस जाता है. नौजवानों ने शहर को कत्बाजी और पायलेटिंग का अखाडा समझ रखा है. ऐसे में पैदल चलने वाला हर वक़्त अपनी जान हथेली पर लेकर चलता है, इंदौर कि सड़कों पर चलने वालों को ही बाज़ीगर कहते है. इन पैदल बाज़ीगरों कि बात करें तो यह सड़कों पर ऐसे चलते हैं जैसे अपने स्वास्थ्य की बेहतरी के लिए सुबह की चहलकदमी कर रहे हो. सुबह की सो कॉल्ड मोर्निंग वॉक की तरह.

यातायात को सँवारने के लिए सफ़ेद वर्दी में तैनात जवान कभी किसी ऑटो वाले से तम्बाखू गुटखा खाते नज़र आता है तो कभी सुस्ताते हुए.  वो आसपास फैले वाहनों के जाल को ऐसे निहारता है जैसे यह जाल ईश्वर की बुनी हुई कोई अद्भुत रचना है और वह इसके सौंदर्यबोध से अभिभूत होकर इसका आनंद ले रहा है.

दिन भर भान्ग्वाले भोलेनाथियों, चर्सिराम और गंज़नातों की अपने-अपने ठिकानों पर मौज रहती है, शाम होते ही मदीरापान वालों की रात पाली शुरू हो जाती है. वास्तव में ये धर्म को ना जानने वाले धार्मिक लोग होते हैं. हाथों में ढेर सारे डोरे लच्छे और गले में ताबीज पेंडल इनकी खास पहचान होती है. ये नवरात्री और गणेशोत्सव के दौरान ज्यादा सक्रिय दिखाई देते हैं. सबसे पहले ये नहा धोकर खजराना मंदिर या कभी कभी देवास चामुंडा माता देवी के आशीर्वाद लेने जाते हैं. तब तक गली- चौराहों के अंडे ठेले वाले इनके लिए अहाते और जाजम की व्यवस्था कर देते हैं. इनके आते ही ठेले वाले इनके लिए ओम्लेट, बेन्जो  और डिस्पोसल मुहैया करवाते है, जाहिर है ये अपने ग्राहक को किसी तरह कि परेशानी नहीं होने देना चाहते हैं. जिससे इनके अंडे बिकते रहे और धंधा भी चलता रहे. दो - दो डिस्पोसल के बाद इनका माल तेज़ हो जाता है और ये ऑफिस व स्कूल- कॉलेज से थकी भागी घर लौटती लड़कियों और महिलाओं के शरीर संरचना और सौंदर्य की मदीरात्मक व्याख्या करते हैं.

शहर में रात के वक़्त क्लिनिक और मेडिकल खोजने में कभी दिक्कत आ सकती है पर कलाली का लाल-हरा रंग कहीं भी आसानी से देखा जा सकता है  (यहाँ बैठने की उचित व्यवस्था है ) यहाँ अन्दर बैठकर पीने की उचित व्यवस्था के बाद भी देश का अधिकांश भविष्य सड़क किनारे खुले में मज़े लेता है. कुछ कारबाज़ लडके  ( सिर्फ मारुती वाले ) कर के प्रवेश द्वार खोलकर जस्सी के गाने सब को सुनाते हुए तर होते हैं.

प्राचीन इंदौर की जिस देवी या माता का नाम (यहाँ देवी का नाम नहीं लिखना चाहता हूँ ) लेकर इंदौरवासी शहर के इतिहास का बखान करते हैं, उन्हें शहर को एक बार फिर से ओब्सर्व करना होगा. इंदौर के कलचर का यह हिस्सा रूटीन किस्सा है. ला एंड ऑर्डर बिगाड़ने के बाद भी शहर में रहने कि उची व्यवस्था है.

रात को नशेडी लडकें चाक़ूबाज़ी के करतब दिखाकर कई लोगों को घायल कर देते हैं,  तो कभी दिन दहाड़े घर में घुसकर उचक्के घर लुट जाते हैं. महिलाओं के गले से चैन व मंगलसूत्र झपट लिए जाते है. कभी छोटी बच्चियों को हवस का शिकार बना लिया जाता है. माल्स और मल्टीप्लेक्स विकास कि सही परिभाषा नहीं है. इंदौर को मिनी बाम्बे कहने से इसकी प्रकृति नहीं बदल जाएगी. जुगाली बहुत हो गई, अब सच बोलो भिया. नगर में जहरीली छी: थू है और सिस्टम का एक पूरा की पूरा हिस्सा ओपेरा देख रहा है.

Sunday, July 18, 2010

यूँ ही तुम्हे

तुम एक पंछी बन जाओ
और मैं गगन तुम्हारा

बिखर जाओ
मेरे हर एक छोर पर

और मैं देखता रहूँ
यूँ ही तुम्हे

कभी धूप
कभी शाम
तो कभी चाँद बनते हुए

Wednesday, July 14, 2010

चाय के दो कप

केबिन मै चाय के दो कप

आज सुबह केबिन में
एक जिन्‍दगी
अचानक घुस आई.

कुछ पल ठहरीं
और एक युग रिस गया.

दरवाजों को छुआ
मशीनों को जिंदा किया.

कुछ फर्नीचर कविताओं में तब्दिल हुआ
कुछ कहानियों में.
और कांच के टुकड़े किस्सों में

कुछ सामान अभी भी
मुँह बनाएँ केबिन को घूर रहा था

झुले की चरचरा‍हट
और किलकारियों के बीच
असंख्‍य साँसे बिखर पड़ी.

एक आवाज प्रसव पीड़ा की तरह

मैंने देखा चाय के दो खाली कप
प्यार में थे 

Saturday, July 10, 2010

आधे - आधे हम दोनो और एक जिंदगी .

नापी है कई गलिया और सड़कें
दिन मै , रात मै और दोपहरो मै
कोहरे को चीरते
चांदनी मै नहाएँ
हम दोनो .

देर तक और दूर तक
चलते रहते
उजाले से बेखबर
स्याह रात से निडर
जिंदगी की बातें करते
मजाक उड़ाते उसका
हम दोनो .

धुआँ निगलते
और उगलते
चलते रहते
हम दोनो .

उन दिनों
हम चलते रहते
जीते रहते
कई जिंदगीया एक साथ .

वक्त अब नही है वो
ना ही शहर मुनासिब ये
लेकिन जिंदा है
माचिस की कई गीली तिलिया
जलने को तैयार
सड़कों पर बिखरी पड़ी है .

चमक रहे है अभी भी सड़कों पर
सिगरेट के फेंके हुए कई ठुठ .

चिपकी हुई है चाशनी
चाय के उन गिलासो मै .

कानो मै घुल रहा है
होटलों मै बजता वो संगीत .

जिंदा है यह सब अभी भी
उन धड़कती गलियों
सांस लेती सड़कों
और शोर मचाते
उन चौराहो की तरह
जिन पर जीते थे
आधे - आधे हम दोनो
और एक जिंदगी .

Sunday, July 4, 2010

धुंध

निर्मल वर्मा ... इस शब्द के बारे में सोचते ही एक धुंध सी छा जाती है ... प्राग और वहाँ गिरती सफ़ेद बर्फ आँखों के सामने तैरने लगती है... एक साथ हज़ारों लोग सड़कों के किनारों पर, बार में, क्लबों में ... और यहाँ- वहाँ बीयर पीते दिखाई देते हैं... मैं खुद को शेरी...कोन्याक और स्लिबो वित्से के कोकटेल के नशे में चूर पता हूँ ...

निर्मल वर्मा... इस नाम का कोई आदमी अब मौजूद नहीं है ... बस एक नशा है ज़हन में और डबडबाती आँखों के सामने ओस कि तैरती हुई सेकड़ों गलियां ... गलियों में सिगरेट का बेपनाह ... बेतरतीब... आवारा धुआं ...

निर्मल  वर्मा इस नाम का आदमी पहले भी कहीं मौजूद नहीं था... जो कुछ था वो एक धुंध थी... जो अब तक फैली हुई है किताबों की तहों में ... पेज दर पेज... रात के गर्भ और उसके अंतहीन अँधेरे में ... किताबों से सटे हुए शब्द और मेरी सांस के बीच कि ख़ामोशी में ...

Sunday, June 20, 2010

काफ्का, कामू और बोर्खेज

देह भटकती है
अपने ही अन्दर
हांफ जाने तक
हांफ कर तिड़क जाने तक

तड़पती है किताब दर किताब
पेज दर पेज
काफ्का, कामू और बोर्खेज

शब्दों के अंतहीन अजगर
रेंगते है उसके बिस्तर पर
एक बेतरतीब कमरे की कोख में
छटपटाती है देह रात भर.

Saturday, June 12, 2010

शेरी, कोन्याक, स्लिबो वित्से

मुझे रायना से प्रेम हो गया है
और प्राग से भी
वो खुबसूरत है
प्राग की सफ़ेद बर्फ की तरह
किताब में लिखी रायना से कहीं अधिक

वह मेरी आखों में है
शब्दों से बाहर निकल सांस लेती हुई


सच कहा था तुमने
यह किताब एक नशा है

शेरी, कोन्याक, स्लिबो वित्से
और सिगरेट की बेपनाह धुंध
कार्ल मार्क्स स्ट्रीट बहक गई होगी
नशे में चूर होंगे
वहां के नाईट क्लब्स

वहीं किसी बार में
उदास बैठी होगी मारिया
रायना को खोजते होंगे निर्मल वर्मा
प्राग के खंडहरों में

मुझे रायना से प्रेम हो गया है
और प्राग से भी .

Monday, May 24, 2010

वो कोई कैदखाना तो नहीं

मई का महीना है और पारा 44 - 45  पर है. गाँधी का कमरा तकरीबन साढ़े तीनसो से चारसो लोगों से भरा है. उस पर कार्यक्रम के व्यवस्थापकों ने हॉल की करीब पच्चीस- तीस ट्यूबलाईट और चार - पाँच हेलोजन भी जला रखे हैं जिन्हें संगीत की महफ़िल के लिहाज से बुझा देने का ख़याल उनके मन में एक बार भी नहीं आया. कम से कम उर्जा की बचत और एनवॉयरमेंट के बारे में ही सोच लेते. प्रथम पंक्ति में शहर के कुछ रसूखदार लोग भी है स्वाभाविक था गर्मी ओर बढ़ना ही थी. ये तो अच्छा हुआ कि शहर का भू- माफिया बॉबी छाबड़ा चार दिन पहले ही पुलिस के हत्थे चढ़ गया नहीं तो गाँधी के कमरे में आग ही लग जाती. इन सब के बावजूद वहाँ यह देखना अच्छा लग रहा था कि ये रसूख लोग ओर नेता किसी कलाकार को सुनने के लिए फर्श पर आलती -पालती मारकर बैठे थे.
देवास में एक साल पहले पंडित मुकुल शिवपुत्र को सुनकर जो नशा चढ़ा था वो इंदौर में उतरा. लेकिन देवास और इंदौर के बीच के समय में शिवपुत्र की गायकी की खुमारी बाकायदा बनी रही. इसी अन्तराल में अपने कुछ अच्छे दोस्तों से पंडित जी की सीडियां मांग-मांग कर सुनी. इंदौर में उन्हें सुनने का यह एक और मौका था. कुछ लोग हिम्मत और साहस दिखाकर शिवपुत्र को नेमावर आश्रम से लाये और कुछ दिनों तक इंदौर में किसी अखाड़े में कैद कर के रखा. बाईस मई को कुमार गंधर्व जयंती समारोह के बहाने गवाया लेकिन देवास वाला जादू नदारद रहा.

इंदौर में उनके सुनने वाले ज्यादा थे जो धीरे- धीरे घटते चले गए वहीं देवास में चालीस -पचास लोग थे जो वहीं जब्त होकर रह गए. यही फर्क था. सच! इस बार नशा नहीं हुआ. पता नहीं क्यों, पर नहीं हुआ. इसका कोई लौजिकल कारण नहीं है. संगीत में मेरी समझ भी इतनी गहरी नहीं है कि मै उनके किसी सुर को या राग को ख़ारिज करूँ. बस... अच्छा नहीं लगा तो नहीं लगा. देवास में उन्हें सुनना किसी जादू कि तरह था लेकिन इंदौर में मन नहीं लगा. मेरा मोह अभी भंग नहीं हुआ है वे अभी भी क्लासिकल गायकी में पहली पंक्ति के कलाकार है. मै उनके व्यक्तित्व और जीवनशैली से अभिभूत हूँ . जब भी कभी मौका मिला तो उन्हें जरुर सुनूंगा. प्रश्न और उसका जवाब यह है कि कोई भी अच्छा कलाकार हमेशा अच्छा नहीं हो सकता या कोई बुरा कलाकार हमेशा बुरा नहीं हो सकता. अच्छा इन्सान हमेशा अच्छा और बुरा इन्सान हमेशा बुरा हो ये भी जरुरी नहीं. वो घटता - बढ़ता रहता है.

शिवपुत्र की महफ़िल के दुसरे दिन कुछ अखबारों ने अतिरेक के साथ उनकी तारीफ़ मै लिखा है. ये लिखने वाले पूर्वग्रह से ग्रसित है या उनकी जूठी तारीफ़ कर रहे हैं या फिर ये उन हिपोक्रेट लोगों मे से हैं जो सरगम का आरोह - अवरोह भी नहीं जानते और महफ़िलों मे बैठे- बैठे रागों, हरकतों और मुरकियों पर दाद देते रहते हैं.

माफ़ कीजिये ... पंडित मुकुल शिवपुत्र से मैं अभिभूत हूँ और जल्दी ही उनसे कुछ सुनने की उम्मीद लेकर और उन पर कुछ लिखने के लिए नेमावर आश्रम जाऊँगा. लेकिन अख़बार वालों से गुजारिश करूँगा कि  ऐसा ना लिखे कि सुर ही ना मिले. शिवपुत्र कलाकार है कोई कैदखाना नहीं कि बाहर ही ना निकला जा सके .

Thursday, May 20, 2010

तुम

सबकी आँखों मै
फुंकते हो उम्मीदें
सपने बाँटते हो .

घटते रहते हो
अजीब सी कहानियों की तरह
मानों हजारों जिंदगीया ले ली हो
वक्त से उधार तुमने
अब लौटाते हो वापस
एक - एक टुकड़ा जिंदगी
अपने अंदर से तोड़कर .

तुम ईश्वर तो नही
ईश्वर जेसे भी नही .

हाँ , मैंने देखा है
तुम्हारे अंदर
किसी और को सांस लेते हुए
तुम्हारी सांसे उसकी सांसो मै घुलते हुए
शंख बजाते , राख उड़ाते .
सबकी आँखों मै
फुकंते हो उम्मीदें
सपने बाँटते हो .

तुम ईश्वर तो नही
ईश्वर जेसे भी नही
लेकिन मुखोटों के मेलों मै

कुछ - कुछ इंसान के जेसे हो .