Tuesday, August 18, 2009

एब्‍सट्रैक्‍ट कमीने



मुंबई की पटरियों पर सरपट दौड़ती लोकल और बेक ग्राउंड में एक नए किस्म का और कभी कभी जेम्स्बोंड की याद दिलाता म्यूजिक । रेसकोर्स की रेस में भागते घोडों की सी तेज गति की तरह यहाँ से वहाँ लहराते कैमरों ने फ़िल्म को एक अलग ही मंच पर लाकर खड़ा कर दिया है । एक से दुसरे में तब्दील होता सीन इतनी गति लिए होता है की दर्शक बिना पलक झपकाए फ़िल्म देखने को मजबूर हो जाता है। हर सीन इतना कसा हुआ की तमाशबीन पिछला सीन भूल कर आंखों के सामने चलने वाले सीन पर सिमट जाए। चार्ली जब स्क्रीन पर हो तो हम गुड्डू को भूल जाते है और जब गुड्डू दिखाई दे तो चार्ली याद नही आता है, जब स्वीटी दिखती है तो मुंबई की सडकों और लोकल में घुमती वहां की हर उन्मुक्त लड़की बरबस ही याद आ जाती है।

विशाल भारद्वाज कुछ कुछ ही नही बिल्कुल बदले हुए नजर आते है। विशाल ने कमीने में अपने ही पेटर्न को तोडा है। दर्शक फ़िल्म नही मानों ढाई घंटे चलने वाला कोई "मूविंग एब्‍सट्रैक्‍ट आर्ट" देख रहा हो।

मकबूल, ओमकारा और ब्लू अम्ब्रेला देखकर कभी हैरत नहीं होती क्योंकि सभी यह बखूबी जानते है की शेक्सपियर के नाटकों पर विशाल ही इस तरह का बेहतरीन सिनेमा रच सकते है। उनकी फिल्मो में दर्शक आंखों में और चहरे पर उदासी लेकर बाहर निकलता है जिसे हम "सो कॉल्ड ट्रेजेडी" कहते है जिसमे विशाल माहिर भी है।

ओथेलो का देसी चरित्र ओमकारा अपनी पत्नी पर अविश्वास और मानविय स्वार्थपूर्ण षडयंत्र में फंसकर मृत्यु को गले लगा लेता है। मकबूल का मेकबेथ भी अपने लिए मौत ही चुनता है। दर्शक को यह पता नही होता है कि मकबूल और ओमी शुक्ला उनका नायक है या खलनायक है फ़िर भी उनकी मौत का बोझ अपने कंधो पर लेकर सिनेमा हॉल से बाहर निकलता है।

मकडी और ब्लू अम्ब्रेला को छोड़ दें तो विशाल को शेक्सपियर के नाटकों में दखल देने वाला डायरेक्टर ही माना जाता रहा है और वही दखल अंदाजी उनका अपना पेटर्न बन गई इसलिए विशाल के मुरीदों को यही इंतज़ार था कि अब "डेनमार्क का प्रिन्स हेमलेट" देखने को मिलेगा, गोया कि शेक्सपियर जैसे महान नाटककार की रचनाओं में दखल देना गुस्ताखी है लेकिन फ़िर भी मकबूल और ओमकारा सराहनीय है और इन खुबसूरत रचनाओं को माफ़ किया जा सकता है। बहरहाल हैरत होती है जब विशालनुमा शेक्सपियर सिनेमा से बाहर निकल कर कमीने जैसी बेहतरीन एब्‍सट्रैक्‍ट बनाते है।

स्वयं की अवधारणा तोड़ कर नए पेटर्न का सिनेमा दिखाना या बनाना इम्पोस्सिब्ल नहीं तो मुश्किल तो है ही। कमीने विशाल की शैली नहीं है फ़िर भी विशाल ने ही बनाई है इस बात की खुशी होती है। कम से कम विशाल अपने दर्शकों पर भरोसा तो करते ही है इसीलिए कमीने में उन्होंने एक कदम आगे बढ़ा कर सिनेमा के बेहतरीन अनछुए हिस्सों को छुआ है ।

चार्ली सपने बुनता है और रेसकोर्स के घोडे की सी तेज़ गति से भाग कर उन्हें साकार कराने की कोशिश करता है, वह फौर्टकट से भी छोटे फौर्टकट में यकीन करता है जबकि गुड्डू कुत्ती दुनिया के कमीनेपन का शिकार होता रहता है, बहरहाल तमाशे तो बहुत होते है फिल्म कभी कभी बनती है।

Thursday, August 13, 2009

अनंत प्रकाश की ओर

सुबह - सुबह सड़क पर
जब धूल की तरह उड़ती है यादें
तो मन कहता है कि चले आओ .

शाम को जब अपने घर की
खिड़कियों से देखता हूँ
चिड़ियों को चह - चहाते
तो मन कहता है कि चले आओ .

रात को सोने से पहले
सुनता हूँ जब खामोशी के सन्नाटे
तो मन कहता है कि चले आओ .

चले आओ क्योंकि
मै जीवन के उस अंधेरे घर मै खड़ा हूँ
जहाँ से तुम्हारे पास नही आ सकता
ना तुम मुझे देख सकती हो
ना ही मै तुम्हे दिखाई देता हूँ
तुम मुझे सिर्फ मह्सुस कर सकती हो
क्योंकि मै सिर्फ एक अह्सास हूँ
और खड़ा हूँ अभी भी उस अंधेरे घर मै
इस उम्मीद मै कि कहीं से तुम आओगी
और मुझे अपने साथ ले जाओगी
उस अनंत प्रकाश की और
जहाँ सिर्फ तुम मुझे दिखाई देती हो
और सिर्फ मै तुम्हे दिखाई दे सकूँगा.

कभी - कभी देखता हूँ जब
उस अनंत प्रकाश की किरणों को लह - लहाते
तो मन कहता है कि चले आओ

जहाँ कहीं भी हो चले आओ .

Tuesday, August 4, 2009

आदमी


मै रोज इस कुएँ मै झांकता
पानी पर अपनी परछाई देखता
आवाज भी लगाता हूँ
कि कोई सदा लौटकर आएगी
और मुझे अपना पता बताएगी

मगर सड़क पर
दौड़ती , हांफती
इन मशीनो ने
मुझे बहरा बना दिया
और अंधा भी.

बादलों की उंचाईया नापती
इन इमारतों ने मुझे छोटा कर दिया
इतना छोटा
कि बच्चों के लिए
पेड़ से आम नही तोड़ सकता
ना ही अपनी माँ के लिए तोड़ पाता हूँ बिलपत्र.

वो कोई और ही होगा
जिसने अपनी प्रेमिका के लिए तोड़े होंगे तारे.

इंद्रधनुश से रंग चुरा कर
बहन को दिए होंगे
आंगन मै रंगोली बनाने के लिए.

वो कोई और ही होगा
जिसने सुरज मै से
रोशनी की मुट्ठी भर कर
बीवी की मांग भर दी होगी .

आदमी ... ?

नही... नही...
आदमी तो हरगिज नही

मै तो रोज इस कुएँ मै झांकता
पानी पर अपनी परछाई देखता
आवाज भी लगाता हूँ
कि कोई सदा लौटकर आएगी
और मुझे अपना पता बताएगी

Thursday, July 16, 2009

अमंगल में मंगल बिस्मिल्‍लाह...


साँसें ही जीवन होती है और यही साँसें उस्‍ताद बिस्मिल्‍लाह खान साहब अपनी शहनाई में फुँकते थे जो ध्‍वनि बनकर जीवन में तब्दिल हो जाती थी। कहते है कि ध्‍वनियाँ कभी मरती नहीं, विज्ञान ने भी इस बात का समर्थन किया है कि ध्‍वनियाँ हमेशा फिजाओं में गुँजती है। जब ध्‍वनियाँ जिंदा है तो क्‍या इस बात को नहीं माना जा सकता कि बिस्मिल्‍लाह भी अपनी शहनाई की ध्‍वनियों में, सुरों में, बाबा विश्‍वनाथ के मंदिर में, गंगा किनारे बनारस में जिंदा है?

बिस्मिल्‍लाह बिहार के डुमरांव में राजघराने के नौबतखाने में शहनाई बजाने वाले परिवार में जन्‍में थे। शहनाई बजाना उनका खानदानी पेशा रहा है। जब वे बहुत छोटे थे तभी अपने मामा के साथ बनारस आ गए। उनके मामा बाबा विश्‍वनाथ के नौबतखाने में शहनाई बजाते थे इसी जगह पर खान साहब ने शहनाई का रियाज करना शुरू कि‍या। वे यहाँ गंगा में खूब नहाते और फिर बालाजी के सामने घंटों रियाज करते, सच्‍चे सुर की खोज करते।

बिस्मिल्‍लाह ने एक बार कहा था कि यहीं र‍ियाज करते-करते भगवान बालाजी उनके सामने आए और सिर पर हाथ फेर कर कहा कि 'जाओ खूब मजे करो'

फिजाओं में साम्‍प्रदायिकता का जहर घोलते समय यह याद रखना चाह‍िए कि बिस्मिल्‍लाह एक सिया मुसलमान थे जो सुबह बाबा विश्‍वनाथ के मंदिर में शहनाई बजाते, लंगोट पहन कर गंगा में नहाते और बालाजी के सामने रियाज करते। वे पाँच बार के नमाजी थे लेकिन मानते थे कि बालाजी ने ही उन्‍हें शहनाई वरदान में दी है।

क्‍या वह इंसान जो ना ह‍िंदू था और ना मुसलमान विश्‍वनाथ के मंदिर में, गंगा के तट पर बनारस में जिंदा नहीं है? क्‍या ऐसा बिस्‍िमल्‍लाह 15 अगस्‍त 1947 की आजादी की सुबह बनकर लाल किले पर शहनाई नहीं बजा रहा है? क्‍या बिस्मिल्‍लाह जीवन की ध्‍वनि बनकर देश की फिजा में सुर बनकर नहीं बिखरा हूआ है? मृत्यु तो हम सभी की हो गई है कि हमने उनके मकबरे के लिए आज तक चार ईंटे और कुछ स‍ीमेंट तक मुहैया नहीं कराई। कहीं पढ़ा था कि एक बार तो उन्‍हें अपने संयुक्‍त परिवार को चलाने के लिए शहनाई बजाने के लिए जयपूर जाना पड़ा ताकि कुछ पैसे मिल जाए।

ये वही बिस्मिल्‍लाह है जिन्‍हें अमेरिका की एक संस्‍था 'रॉकफेलर फाउंडेशन' अमेरिका में बसाने के लिए हमेशा प्रयास करती रही। संस्‍‍था ने बिस्मिल्‍लाह को उनके कलाकार साथियों के साथ अमेरिका में बसाना चाहा इस वादे के साथ कि वे उन्‍हें अमेरिका में बनारस जेसा उनके मन-माफिक वातावरण उपलब्‍ध कराएँगे। इस पर बिस्मिल्‍लाह ने कहा था कि अमेरिका में बनारस तो बना लोगे पर वहाँ 'मेरी गंगा कहाँ से बहाओगे'

फ‍िजाओं में जहर घूला हुआ है लेकिन ध्‍वनियाँ अभी भी जिंदा है, सुर हवाएँ बनकर अभी भी बह रहें है। शहनाई की मंगल धुनें अभी भी लहरें बनकर गंगा के तट से टकरा रही है। बनारस, काशी, मथुरा, मक्‍का और मदिना में अभी भी मंगल गान गाए जा रहे है, मंगल नृत्य किए जा र‍हे है।

आज के दौर में कोई इस लायक तो नहीं कि किसी का श्राध्‍द करे और फातेहा पढ़े, मैं खुद को तो इस लायक समझता ही नहीं लेकिन फिर भी इस श्राध्‍द में बिस्मिल्‍लाह का फातेहा पढ़ने की कोशिश जरूर करूँगा। कोई खुद को अगर उनका श्राध्‍द करने लायक समझे तो जरूर करे। अमंगल में मंगल बिस्मिल्‍लाह...

Friday, July 3, 2009

बाबा ब्लॉगनाथ की जय हो




क्या बुरे दिन आ गए थे. कितने मंदिर गए। दरगाह पर मत्था टेका। ताबिज बंधवाए कि यह पत्रकार बनने का भूत भाग जाए पर कोई फायदा नही हुआ। घर वालो ने भी अपना सारा जोर लगा दिया। कई नीम - हकीमो को हमे दिखाया पर यह तो होनी थी इसे कौन टाल सकता था भाग मै लिखा कोई टाल सकता है क्या भला. इसी संकट की घड़ी मै आपकी एंट्री हुई बाबा. वाह बाबा आपकी महीमा ही न्यारी है आपने भूखे कलमकारो के मूह मै हाथ डाल दिया है अब मै आपके क्या गुण गाउ आपने तो सभी छोटे - बड़े कलमकारो के के वारे - न्यारे कर दिए . क्या उंचे , क्या नीचे , क्या काम वाले , क्या बेकाम . आपने तो सभी की प्यास बुझा दी , सबकी भूख मिटा दी बाबा . कसम बाबा भोलेनाथ की आप भगवान भोलेनाथ से कम नही . जेसे उन्होने अमृत- मंथन से निकला जहर पीया था वेसे ही आप भी हम सब छोरे - छपाटों के सीने मै उबलता हुआ जहर पीने आ गए हो . क्या दिन थे कसम से . हमे कोई नही पूछता था . ना ही कोई हमारा नाम ही लेता था . लिखने के लिए गली - गली , मोहल्ले - मोहल्ले भटकते थे . छटपटाते थे . कभी यह दैनिक तो कभी वो सांध्य. मगर कोई भी कागद कारा हमारे पेट की भूख और मन की ताप शांत करने नही आया . एक आप ही हमारे खेवनहार बनकर आए हो . अब आप ही हमारे माई - बाप और आप ही हमारे अन्नदाता है . आप ही हमारी कलम की लाज रख सकते है. जितना जो कुछ , थोड़ा बहुत हम जानते है वो लिख सकते है . आपके सामने उगल सकते है . इसे अब आप ही पचा सकते है . हे बाबा ब्लॉगनाथ आपको कसम हे बाबा भोलेनाथ की . आपको हमारा यह जहर भी पीना पड़ेगा और हमे जिंदा रखना पड़ेगा. नही तो हम किधर जायेंगे . अपनी पीर किसे बतायेंगे. क्या करेंगे . कहाँ हम अपना जहर उगलेंगे. सारे अखबारों, पत्रिकाओ पर तो इन तमाम साहित्यकारों और लेखकों ने अधिग्रहण कर लिया है. अब इन्हे कौन समझाए कि यह अधिग्रहन भी सिंगुर और नंदीग्राम जेसा ही है. इन साहित्य्कारो और लेखको मे कुछ तो मर - खप गए है फिर भी अपनी कब्रो मै से निकल - निकल कर हमारी लिख्ने की जो थोड़ी - बहुत स्पेस है वो भी छीन लेते है . और जो जिंदा है वो बार - बार अपना फन उठाकर ऐसा जहर उगलते है कि हम नये- नवेले , अज्ञानी , अभाशी , अधर्मी छोरे - छपाटे डरकर , दुबक कर ऐसा मूह बना लेते है कि हमारे चेहरे पर पत्रकार होने का कोई लक्षण ही नजर ना आए . वेसे भी इन साहित्यकारों के डर से हम अपने पत्रकारिक और लेखकिय गुण उजागर नही कर पाते है उपर से इसके ( पत्रकारिता ) के लक्षण भी इनके खौफ से हमे छुपाना पड़ते है. ऐसे मै हम किधर जाते , कहाँ अपनी कलाकारी दिखाते , कौन हमारी लिखी बांचता. अब आप ही बताओ बाबा ब्लॉगनाथ हुए ना आप हमारे बाबा भोलेनाथ .

Tuesday, June 30, 2009

एक दिन शाम को



तालाब का किनारा

धुँए सी सफ़ेद लहरें

कतारों में हरिकेन सुलग रहे है

रोटी की महक

और मेरे सिगरेट के कश ने

वक्त को जिंदगी में बदल दिया है

में जिंदगी की सबसे हसींन साँस ले रहा हूँ

मानो वक्त को उँगलियों पर लपेट लिया हो मैने

गाँव की लड़कियां अब औरते हो गई है

कुछ अभी भी मेरी आंखों में पिघल रही है

मेरा दोस्त मुर्गा सेक रहा है

और में जिंदगी चख रहा हूँ

Saturday, June 13, 2009

अनिश्चित



मैं अनिश्चित हूँ

तुम भी

वो भी

और हम सब

अनिश्चित ...

Friday, May 22, 2009

बेसुर भीड़




कानों मे पिघलने लगती है ध्वनियाँ


तबला... तानपुरा...




बिलखने लगते है कई घराने


साधते रहे जो सुरों को उम्रभर




मै गुजार देता हूँ सारे पहर इन्टरनेट पर


और डाउनलोड कर लेता हूँ कई राग


भैरवी


आसावरी


खमाज


साँस बस चल रही है


मै ख़याल और ठुमरी जी रहा हूँ




कबीर हो जाता हूँ कभी


कुमार गन्धर्व आ जाते है जब


"उड़ जायेगा हंस अकेला


जग दर्शन का मैला "




ख़याल फूटकर तड़पने लगता है


बनारस की सडकों पर


पं छन्नूलाल मिश्र


"मोरे बलमा अजहूँ न आए "




छलक पड़ती है गजल


रिसने लगती है कानों से


"रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ"




यह अलग बात है की तुम अभी भी


वेंटिलेटर पर सुर साध रहे हो मेहदी हसन।




गन्धर्व का घराना भटकता है सडकों पर


देवास


भोपाल


होशंगाबाद


मुकुल शिवपुत्र


किसी अज्ञात सुर की तलाश मै


इस बेसुरी भीड़ के बीच ...








Monday, May 18, 2009

मेरी प्यारी ओफेलिया


हो या न हो


सवाल बस यही है


क्या सही है घुटते रहना


अपनी ही सोच में


और सह लेना हर उस बात को


जो किस्मत ने तय की है


न कोई आंसू न कोई शिकायत


बस एक चुप्पी...


जो किसी को कुछ जानने न दे


कहीं छूट न जाए पकड़ वक्त से


या फ़िर सही अंत जीवन का


जिसमे मर्जी अपनी हो


सिर्फ़ अपनी...


मगर सवाल तो यह है मेरी प्यारी ओफेलिया


की यह सवाल है क्या...?

Thursday, February 12, 2009

मौत ! तुम शाम के मुहाने पर बैठी हो.

मेरे दुख में शामिल हो मेरी ही इच्छा 
उदासी भी आए तो कहने पर
मेरी मर्जी के विरूद्ध 
तुम रुला ना सकों मुझे   

हंसू तो शामिल हो हाँ मेरी 
चलूं तो अधिकार हो रास्ते पर 

कि अब मुड सके ना घुटने उलटी तरफ 

ख़ुशी खड़ी रहे दरवाजे पर 
गुब्बारों की शक्ल में
बच्चे संगीत सीखें 
दोहरायें पुरखों की कविताएँ  
और सीखें पेड़ों को देखना  
पहाड़ों पर चढ़ना

देख सकूँ मैं अपनी ही साँसों को 
आते हुए - जाते हुए

देह का बोझ हल्का हो 
इतना कि लपेट सकूँ आत्मा के इर्द -गिर्द 

रद्द कर दूँ अपने दिमाग का सौदा
भले बयाना ही डूब जाए 

खरीद लूँ बिकी हुई उँगलियाँ वापस
जो दम तोडती है की- बोर्ड पर 

ये मेरी जिन्दगी है 
मैंने जीने का फैसला किया है 

मौत ! तुम शाम के मुहाने पर बैठी हो
मैं इकट्ठा करूँ लकड़ियाँ .

Saturday, March 3, 2007

बंबई

अब लिखना है मुश्किल
उतना जितना प्रेम का मिल जाना 
  
इस से तो अच्छा है
कि टपक जाये एक आंसू छम से
और तुम सुन सको उसका गिरना

अब कहना है मुश्किल कुछ भी
इस से तो अच्छा है
कि मैं खड़ा रहूँ अतीत के बम्बई में

सायन की गली हो
और तुम मुझे लेने आओ
उसी पहली बार की तरह

या फिर साथ चलो पटरियों के किनारों पर
और बताओ मुझे कि  देखो
वो मरीन ड्राइव है और ये बेंडस्टैंड

सेकड़ों फास्ट और लोकल के बीच भी
कितने लोकल थे हम दोनों
इतना कि किसी को जानते नहीं थे
सिवाय एक दुसरे के

बस! यही एक जानकारी थी कि
हम दोनों है

कैसे रहे हम इतने लोगों के बीच 
सिर्फ अपना अपना होकर 
तुम कितने तुम्हारे 
और मैं कितना खुद मेरा था

मुश्किल है बहुत
अब तुम्हारा नाम लेना
या तुम मेरा नाम दोहराओ  
इस से तो अच्छा है कि
हम खड़े रहें ट्रेन के इंतज़ार में
या गेट पर खड़े होकर
सुनते रहें हवाओं को
या उतर जाये यूँही हाजी अली पर 
या भीग आयें खारे पानी में 
और जब हम लौटे कमरे पर 
तो हमारे पैरों की उँगलियों में रेत चिपकी हो 

या चलते रहे चर्चगेट की सड़कों पर  
थककर हार जाने के लिए
चूर हो जाने तक

सच कहूँ तो हम कुछ भी नहीं
न तस्वीरें न मांस और खून
और न ही कोई जादूगर

तुम बस मेरा मिजाज लौटा देते हो
साल दर साल
किश्तों में
और में जिन्दा रहता हूँ
तुम्हारी चुकाई हुई
उन किश्तों के सहारे






Sunday, November 12, 2006

पहाड़गंज

अपनी दिल्ली छोड़कर
मेरी सुरंगों में चले आते हो
पहाड़गंज तुम। 

मैं इन रातों में
आँखों से सुनता हूँ तुम्हे
मरे हुए आदमी की तरह।  

ट्रेनें चीखती हैं तुम्हारी हंसी में
मैं अपनी नींद में जागता हूँ।

मेरे सपनों में तुम उतने ही बड़े हो
जितने बड़े ये पहाड़ हमारे दुखों के। 

मैं देखता हूँ
तुम्हारी कमर की लापरवाहियां
और उस शहर के रास्ते
जिसके पानी पर चलते - चलते
थक गए थे हम।

मैं एक सांस खींच लेता हूँ तुम्हारी
जीने के लिए।

कमरें सूंघता हूँ होटल के
उस गली में
धुआं पीता हूँ तुम्हारे सीने से

मैं भूलना चाहता हूँ 
तुम्हारी दिल्ली और अपना पहाड़गंज 
जिसके नवंबर में 
तुम्हारे होठों की चिपचिपी आग से 
सिगरेट जला ली थी मैंने।
तुम धूप ठंडी करते थे मेरी आँखों में 
मैं गुलमोहर के फूल उगाता था तुम्हारे हाथों में। 


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