Thursday, February 12, 2009

मौत ! तुम शाम के मुहाने पर बैठी हो.

मेरे दुख में शामिल हो मेरी ही इच्छा 
उदासी भी आए तो कहने पर
मेरी मर्जी के विरूद्ध 
तुम रुला ना सकों मुझे   

हंसू तो शामिल हो हाँ मेरी 
चलूं तो अधिकार हो रास्ते पर 

कि अब मुड सके ना घुटने उलटी तरफ 

ख़ुशी खड़ी रहे दरवाजे पर 
गुब्बारों की शक्ल में
बच्चे संगीत सीखें 
दोहरायें पुरखों की कविताएँ  
और सीखें पेड़ों को देखना  
पहाड़ों पर चढ़ना

देख सकूँ मैं अपनी ही साँसों को 
आते हुए - जाते हुए

देह का बोझ हल्का हो 
इतना कि लपेट सकूँ आत्मा के इर्द -गिर्द 

रद्द कर दूँ अपने दिमाग का सौदा
भले बयाना ही डूब जाए 

खरीद लूँ बिकी हुई उँगलियाँ वापस
जो दम तोडती है की- बोर्ड पर 

ये मेरी जिन्दगी है 
मैंने जीने का फैसला किया है 

मौत ! तुम शाम के मुहाने पर बैठी हो
मैं इकट्ठा करूँ लकड़ियाँ .

Saturday, March 3, 2007

बंबई

अब लिखना है मुश्किल
उतना जितना प्रेम का मिल जाना 
  
इस से तो अच्छा है
कि टपक जाये एक आंसू छम से
और तुम सुन सको उसका गिरना

अब कहना है मुश्किल कुछ भी
इस से तो अच्छा है
कि मैं खड़ा रहूँ अतीत के बम्बई में

सायन की गली हो
और तुम मुझे लेने आओ
उसी पहली बार की तरह

या फिर साथ चलो पटरियों के किनारों पर
और बताओ मुझे कि  देखो
वो मरीन ड्राइव है और ये बेंडस्टैंड

सेकड़ों फास्ट और लोकल के बीच भी
कितने लोकल थे हम दोनों
इतना कि किसी को जानते नहीं थे
सिवाय एक दुसरे के

बस! यही एक जानकारी थी कि
हम दोनों है

कैसे रहे हम इतने लोगों के बीच 
सिर्फ अपना अपना होकर 
तुम कितने तुम्हारे 
और मैं कितना खुद मेरा था

मुश्किल है बहुत
अब तुम्हारा नाम लेना
या तुम मेरा नाम दोहराओ  
इस से तो अच्छा है कि
हम खड़े रहें ट्रेन के इंतज़ार में
या गेट पर खड़े होकर
सुनते रहें हवाओं को
या उतर जाये यूँही हाजी अली पर 
या भीग आयें खारे पानी में 
और जब हम लौटे कमरे पर 
तो हमारे पैरों की उँगलियों में रेत चिपकी हो 

या चलते रहे चर्चगेट की सड़कों पर  
थककर हार जाने के लिए
चूर हो जाने तक

सच कहूँ तो हम कुछ भी नहीं
न तस्वीरें न मांस और खून
और न ही कोई जादूगर

तुम बस मेरा मिजाज लौटा देते हो
साल दर साल
किश्तों में
और में जिन्दा रहता हूँ
तुम्हारी चुकाई हुई
उन किश्तों के सहारे






Sunday, November 12, 2006

पहाड़गंज

अपनी दिल्ली छोड़कर
मेरी सुरंगों में चले आते हो
पहाड़गंज तुम। 

मैं इन रातों में
आँखों से सुनता हूँ तुम्हे
मरे हुए आदमी की तरह।  

ट्रेनें चीखती हैं तुम्हारी हंसी में
मैं अपनी नींद में जागता हूँ।

मेरे सपनों में तुम उतने ही बड़े हो
जितने बड़े ये पहाड़ हमारे दुखों के। 

मैं देखता हूँ
तुम्हारी कमर की लापरवाहियां
और उस शहर के रास्ते
जिसके पानी पर चलते - चलते
थक गए थे हम।

मैं एक सांस खींच लेता हूँ तुम्हारी
जीने के लिए।

कमरें सूंघता हूँ होटल के
उस गली में
धुआं पीता हूँ तुम्हारे सीने से

मैं भूलना चाहता हूँ 
तुम्हारी दिल्ली और अपना पहाड़गंज 
जिसके नवंबर में 
तुम्हारे होठों की चिपचिपी आग से 
सिगरेट जला ली थी मैंने।
तुम धूप ठंडी करते थे मेरी आँखों में 
मैं गुलमोहर के फूल उगाता था तुम्हारे हाथों में। 


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